देश मंथन डेस्क
होरी के वंशजों की त्रासदी

अजय अनुराग:
बेशक, ‘गोदान’ का नायक ‘होरी’ गोदान ही नहीं समूचे हिंदी कथा साहित्य का ‘हीरो’ है और उसकी त्रासदी हमें परेशान भी करती है, लेकिन क्या यह सच नहीं है कि उसकी त्रासदी में कुछ हिस्सेदारी उसकी भी है? होरी के चरित्र में जो एक अजीब किस्म का दब्बूपन है वही उसके शोषण का कारण है, जिससे वह कभी मुक्त नहीं हो पाता।
खजियार – स्विटजरलैंड 6194 किलोमीटर…

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
खजियार यानी सपनीली दुनिया। दस से ज्यादा हिंदी फिल्मों में खजियार के सौंदर्य को समेटने की कोशिश फिल्मकारों ने की है। खजियार हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले का एक गाँव है, जिसे हिल स्टेशन का दर्जा प्राप्त है। यह 1920 मीटर की ऊँचाई पर है। यह डलहौजी से भी 24 किलोमीटर है और चंबा शहर से भी 28 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। तीन किलोमीटर की परिधि में एक बड़ा हरा भरा ग्राउंड है। इस ग्राउंड के बीचों बीच झील है। इस झील को गाँव के लोग पवित्र और रहस्यमय भी मानते हैं।
सभ्यता का रहस्य

प्रेमचंद :
यों तो मेरी समझ में दुनिया की एक हजार एक बातें नहीं आती-जैसे लोग प्रात:काल उठते ही बालों पर छुरा क्यों चलाते हैं ? क्या अब पुरुषों में भी इतनी नजाकत आ गयी है कि बालों का बोझ उनसे नहीं सँभलता ? एक साथ ही सभी पढ़े-लिखे आदमियों की आँखें क्यों इतनी कमजोर हो गयी है ? दिमाग की कमजोरी ही इसका कारण है या और कुछ? लोग खिताबों के पीछे क्यों इतने हैरान होते हैं ? इत्यादि-लेकिन इस समय मुझे इन बातों से मतलब नहीं। मेरे मन में एक नया प्रश्न उठ रहा है और उसका जवाब मुझे कोई नहीं देता।
रोटी, कपड़ा और मकान

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
हमारे शहर में फिल्म लगी थी रोटी, कपड़ा और मकान। रिक्शा पर लाऊडस्पीकर लगा कर एक आदमी आता और माइक पर अनाउंस करता, आपके शहर के रूपम सिनेमा हॉल में लगातार पच्चीस हफ्तों से धूम मचा रहा है, ‘रोटी, कपड़ा और मकान’। वो इतना बोलता और फिर लाउडस्पीकर पर गाना बजता— “तेरी दो टकिए की नौकरी, मेरा लाखों का सावन जाए…।”
सवा सेर गेहूँ

प्रेमचंद :
किसी गाँव में शंकर नाम का एक कुरमी किसान रहता था। सीधा-सादा गरीब आदमी था, अपने काम-से-काम, न किसी के लेने में, न किसी के देने में। छक्का-पंजा न जानता था, छल-प्रपंच की उसे छूत भी न लगी थी, ठगे जाने की चिन्ता न थी, ठगविद्या न जानता था, भोजन मिला, खा लिया, न मिला, चबेने पर काट दी, चबैना भी न मिला, तो पानी पी लिया और राम का नाम लेकर सो रहा। किन्तु जब कोई अतिथि द्वार पर आ जाता था तो उसे इस निवृत्तिमार्ग का त्याग करना पड़ता था। विशेषकर जब साधु-महात्मा पदार्पण करते थे, तो उसे अनिवार्यत: सांसारिकता की शरण लेनी पड़ती थी। खुद भूखा सो सकता था, पर साधु को कैसे भूखा सुलाता, भगवान् के भक्त जो ठहरे !
डलहौजी से मिनी स्विटजरलैंड की ओर…

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
हमारी अगली मंजिल थी खजियार। हिमाचल प्रदेश का स्विटरजरलैंड। जहाँ हमने अगले तीन दिन रहना तय किया था। बड़ी संख्या में ऐसे सैलानी होते हैं जो डलहौजी में रुकते हैं। यहीं से गाड़ी बुक करके खजियार जाते हैं। वहाँ चार घंटे गुजारने के बाद लौट आते हैं। पर हमारी योजना तो वहाँ कुछ दिन और रात गुजराने की थी।
रक्त दान : लोगों में जागरूकता की कमी

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
बच्चे को बहुत चोट लगी थी। खून बहुत बह गया था। बच्चे को लेकर कर माँ-बाप सरकारी अस्पताल पहुँचे थे। माँ दोनों हाथ जोड़ कर डॉक्टर के आगे गुहार लगा रही थी कि डॉक्टर साहब आप भगवान हो, किसी तरह मेरे बच्चे को बचा लो।
डलहौजी : बावड़ी का पानी पीकर स्वस्थ हुए सुभाष बाबू

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
यह 1937 की बात है। महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस को जेल में अंगरेजी सरकार की यातना के दौर में टीबी की बीमारी हो गयी। तब डाक्टरों ने उन्हें स्वास्थ्य लाभ के लिए किसी ठंडी जगह में जा कर रहने की सलाह दी।
रूबी के दोषियों को कब मिलेगी सजा?

निभा सिन्हा :
ऐसा लग रहा है कि बिहार के इंटरमीडिएट टॉपर स्कैंडल के दोषियों को सजा दे कर सरकार अपने सारे दोषों से मुक्त होना चाहती है। सिस्टम पर ही बात करनी है तो सिर्फ बिहार ही क्यूँ, समूचे देश की ही बात कर लेते हैं। कभी-कभी एकाध रूबी राय जाने किस मंशा से पकड़ ली जाती हैं तो थोड़े दिन शोर शराबा होता है और फिर सब शांत, जैसे कि समाधान कर दिया गया हो समस्या का।
सदमा या आजादी

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
आपको बताया था न कि पिछले दिनों जब मैं कान्हा में टाइगर देखने गया था, उस रात जंगल के गेस्ट हाउस की बत्ती चली गयी थी। अब टाइगर तो वहाँ मिले नहीं, हाँ, पड़ोस के कमरे में एक डॉक्टर मिल गये।



अजय अनुराग:
विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
प्रेमचंद :
संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
निभा सिन्हा :




