देश मंथन डेस्क
चुप हैं किसी सब्र से तो पत्थर न समझ हमें…

राजेश रपरिया :
मोदी सरकार के लगभग दो साल के राज में खेती और उससे जुड़े लोगों के आर्थिक हालात मनमोहन सिंह राज के अंतिम दो तीन सालों से ज्यादा खराब हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में हताशा व्याप्त है प्राकृतिक आपदाओं की बेरहम मार तो खेती को झेलनी ही पड़ी है पर मोदी सरकार के रवैये ने खेती के संकट को खूंखार बना दिया है। अनेक राज्यों में किसानों की बढ़ती आत्महत्याएँ ग्रामीण भारत में बढ़ती हताशा और निराशा का द्योतक है।
जैसी सोच वैसा जीवन

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
आपने दो बैलों की कथा पढ़ी होगी। आपने दो शहरों की कहानी भी पढ़ी होगी।
आज मैं आपको दो चिट्ठियों की कहानी सुनाता हूँ। मैंने आपसे कहा था न कि पिछले दिनों घर से फालतू कागजों की सफाई में मेरी यादों का लंबा पुलिंदा खुल गया। उन्हीं यादों में से मैं आज आपके लिए ख़ास तौर पर लेकर आया हूँ, दो चिट्ठियों की कहानी।
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अमित शाहः कांटों का ताज

संजय द्विवेदी, अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय :
भारतीय जनता पार्टी ने अंततः अमित शाह को दोबारा अपना अध्यक्ष बना कर यह संदेश दे दिया है कि पार्टी में ‘मोदी समय’ अभी जारी रहेगा। कई चुनावों में पराजय और नाराज बुजुर्गों की परवाह न करते हुए बीजेपी ने साफ कर दिया है कि अमित शाह, उसके ‘शाह’ बने रहेंगे। दिल्ली और बिहार की पराजय ने जहाँ अमित शाह के विरोधियों को ताकत दी थी, तथा उन्हें यह मौका दिया था कि वे शाह की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर सकें। किंतु विरोधियों को निराशा ही हाथ लगी और शाह के लिए एक मौका फिर है कि वे अपनी आलोचनाओं को बेमतलब साबित कर सकें।
सीक्रेट डायरी

आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार
सलमान खान
वाऊ, पीएम मोदी तो सिर्फ सिटीज को स्मार्ट डिक्लेयर कर रहे हैं, पर बिना डिक्लेयर किये इंडिया की जेलें कितनी स्मार्ट हो गयी हैं। संजय दत्त ने जेल में अपनी बाडी सिक्स-पैक-एब्सवाली बना ली। कर्नाटक की एक जेल में अभी रिपब्लिक डे पर एक डांसर का नाच हुआ। कसम से, ऐसी ही जेलें और स्मार्ट होती रहीं, तो अगली बार अपने सारे मामलों में मैं खुद ही जेल जाने की डिमांड कर लूँगा।
महाराष्ट्र का शहर जहाँ कोई मराठी नहीं बोलता

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
महाराष्ट्र का एक ऐसा शहर जो मराठी नहीं बोलता। शहर के सारे साइन बोर्ड हिंदी में दिखायी देते हैं। यह 100% सच है। थोड़ा दिमाग दौड़ाइए। हम पहुँच गये हैं राइस सिटी के नाम से मशहूर गोंदिया में। गोंदिया विदर्भ क्षेत्र का जिला मुख्यालय है। एक बड़ा व्यापारिक शहर है। पर शहर की सीमा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के काफी करीब है। गोंदिया से मध्य प्रदेश की सीमा 22 किलोमीटर और छत्तीसगढ़ की सीमा 46 किलोमीटर है। दोनों राज्यों के लोग यहाँ बड़ी संख्या में व्यापार करने आते हैं।
यादों की लहरें

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
मुझे बचपन में तैरना नहीं आता था, लेकिन अमेरिका में जब मैं अपने बेटे को स्वीमिंग क्लास के लिए ले जाने लगा, तो मैंने उसके कोच की बातें सुन कर तैरने की कोशिश की और यकीन मानिए, पहले दिन ही मैं स्वीमिंग पूल में तैरने लगा।
आगरा का लालकिला – कभी था बादलगढ़

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
दिल्ली का लालकिला तो देश भर में प्रसिद्ध है पर एक लाल किला आगरा में भी है। लाल किला क्यों.. क्योंकि यह लाल पत्थरों से बना है। अगर आकार की बात करें तो आगरा का लालकिला दिल्ली से भी विशाल है। यह 1983 से ही यूनेस्को की विश्वदाय स्मारकों की सूची में शामिल है। पर ताजमहल देखने आने वाले सैलानी कम ही आगरा के किले में पहुँचते हैं। इसे किला ए अकबरी के नाम से भी जानते हैं।
जाति रे जाति, तू कहाँ से आयी?

क़मर वहीद नक़वी, वरिष्ठ पत्रकार :
भारत में जाति कहाँ से आयी? किसकी देन है? बहस बड़ी पुरानी है। और यह बहस भी बड़ी पुरानी है कि आर्य कहाँ से आये? इतिहास खोदिए, तो जवाब के बजाय विवाद मिलता है। सबके अपने-अपने इतिहास हैं, अपने-अपने तर्क और अपने-अपने साक्ष्य और अपने-अपने लक्ष्य! जैसा लक्ष्य, वैसा इतिहास। लेकिन अब मामला दिलचस्प होता जा रहा है। इतिहास के बजाय विज्ञान इन सवालों के जवाब ढूँढने में लगा है। और वह भी प्रामाणिक, साक्ष्य-सिद्ध, अकाट्य और वैज्ञानिक जवाब। हो सकता है कि अगले कुछ बरसों में ये सारे सवाल और विवाद खत्म हो जायें। वह दिन ज्यादा दूर नहीं।
तेलंगाना के जंगलों से होकर दूरंतो से दिल्ली…

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
हैदराबाद से दिल्ली का सफर न जाने कितनी बार किया है। पर खास तौर पर हैदराबाद शहर से ट्रेन के बाहर निकलने के बाद महाराष्ट्र में प्रवेश करने तक के कुछ घंटे निहायत सुहाने लगते हैं। क्योंकि इस दौरान ट्रेन तेलंगाना राज्य के कई जिलों से होकर गुजरती है। आबादी कम नजर आती हैं। मस्ती में बातें करते जंगल ज्यादा नजर आते हैं।
प्रेम एक विश्वास और भरोसा है
संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
मेरी समझ में आज तक ये बात नहीं आयी कि क्यों मेरी कुछ पोस्ट को तीन हजार लाइक मिलते हैं, और कुछ पोस्ट को सिर्फ पाँच सौ लाइक।



राजेश रपरिया :
संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
संजय द्विवेदी, अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय :
आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार
विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
क़मर वहीद नक़वी, वरिष्ठ पत्रकार : 




