देश मंथन डेस्क
साहित्यकारों, कलाकारों और इतिहासकारों का कुचक्र

पद्मपति शर्मा, वरिष्ठ खेल पत्रकार :
इस देश को जिन्होंने नोचा, खसोटा, लूटा और राज किया, वर्तमान से इस कदर बौखला उठे हैं कि उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे क्या करें? इसमें शामिल हैं हवाला कारोबारी, तस्कर, हथियारों के दलाल, वे जिन्हें आजादी बाद रेवड़ी की मानिंद बांटे गये थे कोटा-परमिट और जिनके बल पर काला बाजारी से रातों रात धन कुबेर बन गये वे और उनके वंशज। इनके अलावा वे तथाकथित प्रगतिशील- वामपंथी जिन्होंने समाजवादी विचारधारा के नाम पर आधी सदी से भी ज्यादा समय तक मलाई खायी। वे समाज में आसानी से बुद्धिजीवी का खुद पर ठप्पा लगाने में सफल हो गये। इसी विचारधारा के लोगों में पनपे साहित्यकारों, कलाकारों, कला प्रेमियों और इतिहासकारों की गणेश परिक्रमा ने उन्हें महिमा मंडित किया।
अब फर्जी सेक्युलर सिखाएँगे सहिष्णुता का पाठ

अभिरंजन कुमार :
चीन में यह भी कम्युनिस्ट ही तय करते हैं कि लोग कितने बच्चे पैदा करें। वहाँ की कम्युनिस्ट सरकार ने 36 साल बाद अपने नागरिकों को दो बच्चे पैदा करने की इजाजत दी है। वहाँ पहले एक ही बच्चा पैदा करने की इजाजत थी। दंपति दूसरा बच्चा तभी पैदा कर सकते थे, जब पहली संतान लड़की हो।
रायते में डूबे समोसे का क्या कहना

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
दो समोसे दही के शानदार रायते में डूबे हुए। पत्ते के दोने में परोसे गये। यह है ओरछा की सुबह का नास्ता। हालाँकि रायता समोसा बुंदेलखंड कई शहरों का लोकप्रिय नास्ता है पर जैसा रायता समोसा ओरछा में मिलता है वह और कहीं नहीं मिलेगा। राजा राम मंदिर के सामने चौराहे पर कई मिष्टान भंडार में आपको यह नास्ता मिल जाएगा। समोसे तो आपने अक्सर चटनी के साथ खाये होंगे पर इसे बूंदी रायता में डूबा कर खाने का आनंद कुछ अलग ही है।
बिहार में ‘हवा’ उसकी नहीं, जिसकी जीत होने वाली है!

अभिरंजन कुमार :
बिहार चुनाव एक पहेली की तरह बन गया है। अगड़े, पिछड़े, दलित, महादलित-कई जातियों/समूहों के लोगों से मेरी बात हुई। उनमें से ज्यादातर ने कहा कि उन्होंने बदलाव के लिए वोट दिया, लेकिन साथ ही वे इस आशंका से मायूस भी थे कि बदलाव की संभावना काफी कम है।
हर महिला में माँ छुपी होती है

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
छोटा था तो मेरे स्कूल जाने से पहले माँ जाग जाती थी। चाहे रात को सोने में उसे कितनी भी देर हुई हो, पर वो मुझसे पहले उठ कर मेरे लिए नाश्ता तैयार करती, लंच बॉक्स सजाती, मेरी यूनिफॉर्म प्रेस करती और फिर मुझे प्यार से ऐसे जगाती कि कहीं अगर मैं कोई सपना देख रहा होऊँ तो उसमें भी खलल न पड़ जाए। मैं जागता, रजाई मुँह के ऊपर नीचे करता, फिर सोचता कि रोज सुबह क्यों होती है, रोज स्कूल क्यों जाना पड़ता है, रोज भरत मास्टर को वही-वही पाठ पढ़ कर क्यों सुनाना पड़ता है। मुझे लगता था कि स्कूल को मंदिर की तरह होना चाहिए, जिसकी जब श्रद्धा हो चला जाए।
जम्हाई लेते जंगलों के बीच ओरछा

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
बलखाती बेतवा, जम्हाई लेते जंगलों के बीच छिपा है ओरछा। वैसे ओरछा का मतलब ही होता है छिपा हुआ। तो छिपा हुआ सौंदर्य ही है ओरछा, जिसकी तलाश में दुनिया भर से सैलानी यहाँ पहुँचते हैं। मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले का शहर। पर टीकमगढ़ यहाँ से 90 किलोमीटर है। यूपी का झांसी शहर 16 किलोमीटर है। इसलिए ओरछा पहुँचे का सुगम रास्ता उत्तर प्रदेश के झांसी शहर से है।
मन की खुशी

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
मुझे ठीक से याद है कि गुलबवा की कहानी किसने सुनायी थी। इस सच्ची कहानी सुनाते हुए उसने बताया था कि हर आदमी में दो आदमी रहते हैं। एक बाहर का आदमी और दूसरा भीतर का आदमी। भीतर का आदमी मन है, बाहर का आदमी तन है।
लैला

प्रेमचंद :
यह कोई न जानता था कि लैला कौन है, कहाँ से आयी है और क्या करती है। एक दिन लोगों ने एक अनुपम सुंदरी को तेहरान के चौक में अपने डफ पर हाफ़िज की यह ग़जल झूम-झूम कर गाते सुना-
रसीद मुज़रा कि ऐयामे ग़म न ख्वाहद माँद,
चुनाँ न माँद, चुनीं नीज़ हम न ख्वाहद माँद।
परंपराओं की जंजीरों में जकड़ी लड़कियाँ

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
आइए आज आपको एक लड़की से मिलवाता हूँ।
हार-हार-हार और हार..! आखिर कब थमेगा सिलसिला

पद्मपति शर्मा, वरिष्ठ खेल पत्रकार :
वानखड़े 'भूतो न भविष्यति' बल्लेबाजी का बना गवाह। सिक्के की उछाल में मिली मात और भोथरी गेंदबाजी ने सिरीज का फाइनल का किस तरह से नशा उखाड़ दिया, यह बताने की जरूरत नहीं और यह भी नहीं कि हर किसी का समय होता है मिस्टर धोनी। बाजुओं में जो ताकत आपके थी वह जाती रही और कितने गरीब नजर आये आप बल्ले से, यह भी दर्शकों ने देखा। हार, हार और हार यही बदा है देश के भाग्य में शायद। जो सिलसिला आस्ट्रेलिया से शुरू हुआ, वह आज तक थमा नहीं। बांग्लादेश तक ने पानी पिला दिया था तो यह महाबली द. अफ्रीका है।



पद्मपति शर्मा, वरिष्ठ खेल पत्रकार :
अभिरंजन कुमार :
विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
प्रेमचंद :




