देश मंथन डेस्क
दिल्ली में हंड्रेड परसेंट

आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
एक अखबार में छपी रिपोर्ट ने बताया कि दिल्ली में 64.36% मकान मालिक हैं। 31% किरायेदार हैं। दिल्ली में ये कुछ कुछ गोत्र टाइप मामला है, मकान मालिक ऊंचे गोत्र का, किरायेदार उससे नीचे गोत्र का।
अब ताप में हाथ मत तापिए!

कमर वहीद नकवी , वरिष्ठ पत्रकार
चिन्ता की बात है। देश तप रहा है! चारों तरफ ताप बढ़ रहा है! क्षोभ, विक्षोभ, रोष, आवेश से अखबार रंगे पड़े हैं, टीवी चिंघाड़ रहे हैं, सोशल मीडिया पर जो कुछ 'अनसोशल' होना सम्भव था, सब हो रहा है! लोग सरकार को देख रहे हैं! सरकार किसी और को देख रही है! कुत्ते संवाद के नये नायक हैं!
प्रधानमंत्री की खामोशी के अर्थ-अनर्थ

संजय द्विवेदी, अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय :
तय मानिए यह देश नरेंद्र मोदी को, मनमोहन सिंह की तरह व्यवहार करता हुआ सह नहीं सकता। पूर्व प्रधानमंत्री मजबूरी का मनोनयन थे, जबकि नरेंद्र मोदी देश की जनता का सीधा चुनाव हैं। कई मायनों में वे जनता के सीधे प्रतिनिधि हैं। जाहिर है उन पर देश की जनता अपना हक समझती है और हक इतना कि प्रधानमंत्री होने के बावजूद वे अपनी व्यस्तताओं के बीच भी हर छोटे-बड़े प्रसंग पर संवाद करें, बातचीत करें।
बदलाव की बयार – महात्मा गाँधी सेवा आश्रम जौरा

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
चंबल घाटी में मुरैना शहर से 25 किलोमीटर आगे छोटे से कस्बे में स्थित महात्मा गाँधी सेवा आश्रम जौरा वह जगह है जो देश भर के हजारों लाखों युवाओं को प्रेरणा देती है। इस आश्रम की स्थापना 1970 में हुई। दरअसल महान गाँधीवादी सुब्बराव महात्मा गाँधी के जन्म शताब्दी वर्ष पर चलायी गयी प्रदर्शनी ट्रेन के प्रभारी थे।
प्यार सबसे बड़ी प्रेरणा

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
एक बार मैंने अमिताभ बच्चन से पूछा था कि वो कौन सी चीज है जो आपको लगातार सिनेमा के संसार से जुड़े रहने को प्रेरित करती है? हर आदमी एक ही काम करते-करते एक दिन उस काम से ऊब जाता है। मैंने तमाम बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों को देखा है, जो एक दिन खुद को रिटायर होते देखना चाहते हैं।
‘विराट’ पारी से अंतिम मुकाबला फाइनल हो गया

पद्मपति शर्मा, वरिष्ठ खेल पत्रकार :
वाकई बहुत अच्छा टास जीता धोनी ने और इसी के साथ सिरीज 2-2 की बराबरी पर आकर जीवंत हो उठी अगले रविवार को मुंबई में फाइनल लड़ंत के लिए। खेल का एक घंटे पहले आरंभ होना, ओस की लगभग नगण्य भूमिका, शाम को दूधिया प्रकाश के बीच सीम, स्विंग, स्पिन और दोहरी उछाल, टारगेट का पीछा करने वाली टीम के लिए कहीं से भी मुफीद कंडीशन नहीं कही जा सकती थी।
दुर्गा पूजा@ मेरा गांव

सुशांत झा, पत्रकार :
पता नहीं कितने साल हुए दुर्गा पूजा में गाँव गये हुए। हमारे यहाँ दशहरा नहीं बोलते हैं, दुर्गा पूजा या नवरात्रा बोलते थे। हद से हद दशमी। कलश स्थापन से ही पूजा शुरू। बेल-नोती और बेल तोड़ी..फिर बलि-प्रदान, मेला।
‘फेरिहा’

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
'फेरिहा' एक चौकीदार की बेटी का नाम है। टर्की में रहने वाली फेरिहा मेहनत और लगन से अच्छे कॉलेज में दाखिला पा लेती है और खूब पढ़ना चाहती है। लेकिन उसके पिता को उसकी शादी की चिंता है। उन्होंने अपनी बिरादरी और हैसियत जैसे एक परिवार के लड़के को फेरिहा के लिए पसंद कर रखा है। पिता की निगाह में वही लड़का फेरिहा के लिए उपयुक्त है। वो जानते हैं कि वो लड़का भी फेरिहा को पसंद करता है, उसकी सुंदरता पर मरता है।
खेलों में उग्रवाद की आग पाकिस्तान ने ही लगायी थी !

पद्मपति शर्मा, वरिष्ठ खेल पत्रकार :
पाकिस्तान क्रिकेट के सदर शहरयार साहब छाती पीट-पीट कर रोते हुए घर लौट रहे हैं कि उग्रवादियों के आगे बीसीसीआई झुक गयी और उसने श्रीनिवासन के कार्यकाल के दौरान सिरीज खेलने का जो करार किया था, उसे तोड़ दिया।
बदलाव ही जीवन है

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
दशहरा के महीना भर पहले हमारे घर में सुगबुगाहट शुरू हो जाती थी। मुझे नहीं पता कि घर के बाकी लोग दशहरा का इंतजार क्यों करते थे, पर मैं दशहरा का इंतजार नहीं करता था। माँ सुबह से ही ढेर सारी खाने-पीने की चीजें बनाने में जुट जाती, पिताजी पूजा की तैयारी करते। लेकिन दशहरा का दिन मेरे लिए उदासी का सबब होता। हालाँकि दशहरा पर नये कपड़े पहनने को मिलते थे, पर मेरा मन यह सोच कर उदास रहता कि आज दुर्गा जी की मूर्ति उठ जाएगी, आज उसे नदी में बहा दिया जाएगा और पिछले नौ दिनों से जो उत्सव चल रहा था, वो खत्म हो जाएगा।



आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
संजय द्विवेदी, अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय :
विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
सुशांत झा, पत्रकार :




