Saturday, March 28, 2026

देश मंथन डेस्क

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बहू भी सास बनेगी

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :

जब भी मैं सास-बहू की कहानी लिखता हूँ और उसमें लिखता हूँ कि बहू ने सास को सताया, सास को किसी आश्रम में जाना पड़ा, तो मेरे पास ढेर सारे संदेश आने शुरू हो जाते हैं। ज्यादातर संदेश बहुओं के होते हैं। सबकी शिकायत करीब-करीब एक सी होती है। 

टीम इंडिया को आप जैसे गुरु की सख्त जरूरत है जाक

पद्मपति शर्मा, वरिष्ठ खेल पत्रकार :

आया है सो जाएगा, राजा रंक फकीर। यही जीवन का शाश्वत सत्य है। खेल दुनिया भी उसी का एक अंग है। कल की सी बात लगती है जब मैंने मजबूत कद काठी के एक युवक को अपने डेब्यू मुकाबले में एक सौ पचास किलोमीटर की गति से गेंदबाजी करते देखा और तभी विश्वास हो गया था कि यह लंबी रेस का घोड़ा है, बड़ी दूर तक जाएगा और वर्षों हम इसके बारे में पढ़ते, सुनते और देखते रहेंगे।

बिहार चुनाव में ध्रुवीकरण के लिए पुरस्कार लौटा रहे हैं लेखक

अभिरंजन कुमार :

किसी दिन पुरस्कार लौटाने के लिए यह जरूरी है कि आज पुरस्कार बटोर लो। पुरस्कार मिले तो भी सुर्खियाँ मिलती हैं। मिला हुआ पुरस्कार लौटा दो तो और अधिक सुर्खियाँ मिलती हैं। समूह में पुरस्कार लौटाना चालू कर दो तो क्रांति आ जाती है। ऐसी महान क्रांति देखकर मन कचोटने लगा है। काश...

ज्ञान ही ज्ञान

सुशांत झा, पत्रकार :

उन लोगों पर ताज्जुब होता है जो कहते हैं कि पीएम को बिहार में 40 सभाएँ नहीं करनी चाहिए। अरे भाई, इसका क्या मतलब कि जिस बच्चे को 12वीं में 99 फीसदी नंबर आये वो IIT की परीक्षा में दारू पीकर इक्जाम देने चला जाये? हद है! चुनाव है या फेसबुक पोस्ट कि कुछ भी लिख दिया? विपक्षी दलों के पास नेता नहीं है और जो हैं या तो वो जोकर किस्म के हैं या किसी आईलैंड पर तफरीह कर रहे हैं तो इसमें नरेंद्र मोदी का क्या दोष है? ये तो उस आदमी का बड़प्पन है कि सांढ का सींग पकड़कर मैदान में डटा हुआ है।

हार का ठीकरा सेनापति पर तो जीत का श्रेय भी उसी को

पद्मपति शर्मा, वरिष्ठ खेल पत्रकार :

सुनील चतुर्वेदी की समस्या यह है कि वह बोर्ड प्रबंधन के अंग है। न तो वह खिलाड़ी हैं और न ही समालोचक। सुनील को हर शब्द नाप तौल कर लिखना होता है। उनके पास हम जैसी आजादी नहीं है। सुनील भाई आपने संतोष सूरी के कमेंट के संकेत को शायद अच्छी तरह समझा होगा। आप दूसरों के लिए जो करते हो वही दूसरा आपके साथ करेगा। यही जमाने की रीत है भाई।

आत्मचिंतन का समय आ गया है जनाब धोनी

पद्मपति शर्मा, वरिष्ठ खेल पत्रकार :

आत्मचिंतन का समय आ गया है जनाब महेंद्र सिंह धोनी। आँख बंद कर सोचिए कि क्या शरीर में वह पोटाश बची हुई है? क्या बल्लेबाजी की देसी शैली अपनी औकात पर नहीं आ चुकी है? क्या सहवाग की मानिंद आपकी आँख और पाँव का संयोजन गड़बड़ा नहीं गया? क्या शरीर के करीब फेंकी गयी शार्ट गेंदों के सम्मुख आपकी कमजोरी जगजाहिर नहीं हो चुकी है ? 

बेटा, जी लो जिन्दगी

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :

यह कहानी किसी की आप बीती हो सकती है।

लोकतत्व के अभाव में रचे साहित्य का विधवा विलाप

संदीप त्रिपाठी : 

साहित्यकार कौन है? कहानियाँ, कविताएँ, नाटक, उपन्यास, ललित निबंध, व्यंग्य, आलोचना लिखने वाला साहित्यकार है? आप गोपाल दास नीरज, उमाकांत मालवीय़ को साहित्यकार मानते हैं? कुँवर बेचैन, सुरेंद्र शर्मा, काका हाथरसी, हुल्लड़ मुरादाबादी, चकाचक बनारसी साहित्यकार हैं या नहीं? ओमप्रकाश शर्मा, गुलशन नंदा, सुरेंद्र मोहन पाठक, वेदप्रकाश शर्मा साहित्यकार हैं या नहीं? राजन-इकबाल सिरीज लिखने वाले एससी बेदी क्या हैं? विज्ञान कथाएँ लिखने वाले गुणाकर मुले साहित्यकार माने जायेंगे या नहीं? बच्चों के लिए साहित्य रचने वाले क्या हैं?

माता का हृदय

प्रेमचंद :

माधवी की आँखों में सारा संसार अँधेरा हो रहा था। कोई अपना मददगार न दिखायी देता था। कहीं आशा की झलक न थी। उस निर्धन घर में वह अकेली पड़ी रोती थी और कोई आँसू पोंछनेवाला न था। उसके पति को मरे हुए 22 वर्ष हो गये थे। घर में कोई सम्पत्ति न थी। उसने न-जाने किन तकलीफों से अपने बच्चे को पाल-पोसकर बड़ा किया था। वही जवान बेटा आज उसकी गोद से छीन लिया गया था और छीननेवाले कौन थे ? अगर मृत्यु ने छीना होता तो वह सब्र कर लेती। मौत से किसी को द्वेष नहीं होता। मगर स्वार्थियों के हाथों यह अत्याचार असह्य हो रहा था।

बिहार में सत्ता बदलनी चाहिए

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :

अपने दोस्तों से जब मैं बिहार की दुर्दशा की चर्चा करता हूँ और कहता हूँ कि अब बिहार में सत्ता बदलनी चाहिए, तो मेरे साथी मेरी ओर हैरत भरी निगाहों से देखने लगते हैं, और पूछने लगते हैं कि संजय सिन्हा, कहीं तुम भाजपाई तो नहीं हो गये?