देश मंथन डेस्क
गोकसी के बहाने : परंपरा नहीं, चरित्र है हिंदुत्व का आधार

संदीप त्रिपाठी :
बीते कुछ दिनों से गोकसी के मुद्दे पर हो रहे हँगामे और तमाम नकारात्मक बातों के बीच दो बयान बहुत महत्वपूर्ण हैं। ये बयान हैं बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जिलानी और दिल्ली स्थित जामा मस्जिद के शाही इमाम मौलाना अहमद बुखारी के। इन दोनों ही प्रमुख मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने देश में गोकसी पर रोक लगाने की पैरवी की है।
एक आँच की कसर

प्रेमचंद :
सारे नगर में महाशय यशोदानन्द का बखान हो रहा था। नगर ही में नहीं, समस्त प्रांत में उनकी कीर्ति गायी जाती थी, समाचार-पत्रों में टिप्पणियाँ हो रही थीं, मित्रों से प्रशंसापूर्ण पत्रों का ताँता लगा हुआ था। समाज-सेवा इसको कहते हैं! उन्नत विचार के लोग ऐसा ही करते हैं।
सम्राट अशोक ने बनवाया था साँची का स्तूप

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
दिसंबर 1994 की सर्दियों का समय था जब किसी काम से भोपाल जाना हुआ। पहले दिन को साउथ तांत्या टोपे नगर (टीटी नगर) में यूथ होस्टल में ठहरा। अगले दिन एनवाईपी के भाई प्रिय अभिषेक अज्ञानी आकर अपने घर ले गये। उनके घर हफ्ते भर रहा। इस दौरान वह रोज मुझे मार्ग समझा देते और मैं अपनी मर्जी से अकेले भोपाल और आसपास घूमता रहता। एक दिन साँची जाने को तय किया। सो सुबह सुबह ट्रेन पकड़ी पहुँच गया साँची। साँची में विशाल बौद्ध स्तूप तो है ही। साँची मध्य प्रदेश के दूध का ब्रांड भी है। ठीक वैसे ही जैसे बिहार का सुधा, यूपी का पराग, हरियाणा का वीटा, पंजाब का वेरका, कर्नानटक का नंदिनी
हुक्मरान चला रहे अपनी दुकान

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
छोड़िए उस आज उस राजा की कहानी को, जिसने मुनादी पिटवाई थी कि मेरा सब ले जाओ। आज कहानी सुनाता हूँ, उन चार दोस्तों की जिन्होंने मिल कर बिजनेस करने की ठानी थी।
प्लीज, कम इनफोर्मेशन दें

आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
स्नैपडील, फ्लिपकार्ट, एमेजन, मायंत्रा के आनलाइन शापिंग के जमाने में घणी फँसावटें हैं।
भीड़ के पीछे दूल्हा चलता है, सेनापति तो आगे चलता है

रत्नाकर त्रिपाठी :
बनारस की सड़क पर इतना बड़ा जमावड़ा देखे मुद्दत हो गयी थी। अद्भुत दृश्य था, अगर ये मेला होता, तो इसे बनारस की नाग-नथैया और नाटी-इमली के भरत-मिलाप की तरह लक्खा मेले का दर्जा मिल जाता। माँ गंगा की गोद में मूर्ति विसर्जन की माँग लेकर आबाल-वृद्ध सड़क पर थे। भीड़ की खूबसूरती ये थी कि 80 % लोग एक-दूसरे को जानते नहीं थे, लेकिन 'एक मांग-एक धुन', उन्हें आपस में माला के मोतियों की तरह पिरोये हुई थी।
बलि के बकरों के लिए किसका काँपता है कलेजा?

अभिरंजन कुमार :
अखलाक को किसी हिन्दू ने नहीं मारा। हिन्दू इतने पागल नहीं होते हैं। उसे भारत की राजनीति ने मारा है, जिसके लिए वह बलि का एक बकरा मात्र था। सियासत कभी किसी हिन्दू को, तो कभी किसी मुस्लिम को बलि का बकरा बनाती रहती है। इसलिए जिन भी लोगों ने इस घटना को हिन्दू-मुस्लिम रंग देने की कोशिश की है, वे या तो शातिर हैं या मूर्ख हैं।
गोश्त

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
आज जो कहानी मैं लिख रहा हूँ, वो मुझे नहीं लिखनी थी। आज मेरे मन में था कि मैं उस राजा की कहानी आपको सुनाऊँगा, जिसने एक दिन मुनादी पिटवा कर अपना सब कुछ लुटा दिया था।
तेरे नाम पे सबको नाज है, उसका नाम गरीब नवाज है…

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
1998 के वसन्त में पहली बार अजमेर की यात्रा पर गया था। जयपुर के बाद बस से अजमेर। फिर पुष्कर। एक बार फिर 2008 के मार्च में अनादि और माधवी के साथ अजमेर जाना हुआ। आज इच्छा हुई ख्वाजा को याद किया जाए।
कर्मों की कमाई

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
जब हम छोटे बच्चे थे, तब दशहरा के मौके पर मोहल्ले में छोटा सा स्टेज बना कर नाटक किया करते थे। मोहल्ले के सारे लोग वहाँ जुट जाते और हम 'रसगुल्ला-गुलाब जामुन' वाला नाटक करते। करने को तो हम 'कलुआ की माई वाला नाटक' भी करते, पर मेरा पसंदीदा नाटक 'रसगुल्ला-गुलाब जामुन' हुआ करता था।



संदीप त्रिपाठी :
प्रेमचंद :
विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
रत्नाकर त्रिपाठी :
अभिरंजन कुमार :




