Saturday, March 28, 2026

देश मंथन डेस्क

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सारनाथ – आइए यहाँ इतिहास से संवाद करें

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार : 

वाराणसी घूमने गये हों तो सारनाथ न जाएँ ये कैसे हो सकता है। सारनाथ भारत के ऐतिहासिक विरासत का जीता जागता उदाहरण है। भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के पश्चात अपना प्रथम उपदेश यहीं दिया था। बौद्ध धर्म के इतिहास में इस घटना को धर्म चक्र प्रवर्तन ( Turning of the Wheel) का नाम दिया जाता है।

प्रेम की एक ही भाषा

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :

कोई इटली जाए और संसार की सबसे दर्द भरी प्रेम कहानी की आहट न सुन सके तो यह उसकी किस्मत का दोष है। 

जात क्या पूछो साउथ की

आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :

राष्ट्र एक ही है, यूँ तो, हम सब एक ही हैं, बस यह बात कोई आल्टो कार वाला होंडा सिटी वाले से ना कह दे, होंडा सिटी वाला फौरन खंडन करके बता देगा कि ना हम एक नहीं हैं, कार के हिसाब से तुझमें और मुझमें वही फर्क है, जो बंगलादेश और इंडिया में है।

महागठबंधन की किलेबंदी में दरारें

संदीप त्रिपाठी :

बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव की दृष्टि से हालात रोमांचक होते जा रहे हैं। सीध-सीधे दो खेमे दिख रहे हैं। लोकसभा चुनाव में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की बढ़त से घबराये जनता दल यू नेता नीतीश कुमार ने विधानसभा की जंग जीतने के लिए हरसंभव रणनीति अपनायी। जिस लालू प्रसाद यादव के विरोध के आधार पर अपनी छवि गढ़ी, उसी लालू यादव से हाथ मिला लिया, महागठबंधन के तहत 140 से ज्यादा सीटों पर लड़ने की जिद छोड़ महज 100 सीटों पर लड़ने का समझौता कर लिया।

963 झरोखों वाला गुलाबी नगरी का हवा महल

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार : 

गुलाबी शहर जयपुर में स्थित हवा महल राधा और कृष्ण को समर्पित है। यह महल जयपुर शहर की पहचान है। यह एक राजसी-महल है। सन 1798 में बना ये महल किसी राजमुकुट सा दिखायी देता है। हवा महल की पाँच-मन्जिला इमारत ऊपर से महज डेढ़ फीट चौड़ी है। यह बाहर से देखने पर हवा महल किसी मधुमक्खी के छत्ते के समान दिखायी देती है।

तो कहाँ है वह संगच्छध्वम् ?

कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार :  

चौदह के पन्द्रह अगस्त और पन्द्रह के पन्द्रह अगस्त में क्या फर्क है? चौदह में 'सहमति' का शंखनाद था, पन्द्रह में टकराव की अड़! याद कीजिए चौदह में लाल किले से प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी का पहला भाषण। संगच्छध्वम्! मोदी देश को बता रहे थे कि हम बहुमत के बल पर नहीं बल्कि सहमति के मजबूत धरातल पर आगे बढ़ना चाहते हैं। उस साल एक दिन पहले ही नयी सरकार के पहले संसद सत्र का सफल समापन हुआ था। मोदी इसका यश सिर्फ सरकार को ही नहीं, पूरे विपक्ष दे रहे थे! संगच्छध्वम्!

मौन और मुस्कुराहट

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :

नीरो कभी बाँसुरी नहीं बजाता था। उसे बाँसुरी बजानी भी नहीं आती थी। जिसे बाँसुरी बजानी आयेगी, वह नीरो नहीं हो सकता। 

मुफ्त का यश

प्रेमचंद :

उन दिनों संयोग से हाकिम-जिला एक रसिक सज्जन थे। इतिहास और पुराने सिक्कों की खोज में उन्होंने अच्छी ख्याति प्राप्त कर ली थी। ईश्वर जाने दफ्तर के सूखे कामों से उन्हें ऐतिहासिक छान-बीन के लिए कैसे समय मिल जाता था। वहाँ तो जब किसी अफसर से पूछिए, तो वह यही कहता है 'मारे काम के मरा जाता हूँ, सिर उठाने की फुरसत नहीं मिलती।' शायद शिकार और सैर भी उनके काम में शामिल है ? उन सज्जन की कीर्तियाँ मैंने देखी थीं और मन में उनका आदर करता था; लेकिन उनकी अफसरी किसी प्रकार की घनिष्ठता में बाधक थी।

खो रही है चमकः कुछ करिए सरकार

संजय द्विवेदी, अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय : 

नरेन्द्र मोदी के चाहने वाले भी अगर उनकी सरकार से निराशा जताने लगे हों तो यह उनके संभलने और विचार करने का समय है। कोई भी सरकार अपनी छवि और इकबाल से ही चलती है। चाहे जिस भी कारण से अगर आपके चाहने वालों में भी निराशा आ रही है तो आपको सावधान हो जाना चाहिए।

जीओ और जीने दो

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :

मेरे मन में हमेशा से था कि अगर मैं कभी इटली आया तो कोलेजियम जरूर जाऊँगा, जहाँ ईसा पूर्व कई सौ वर्ष पहले बने उस स्टेडियम में जरूर जाऊँगा, जहाँ ग्लैडिएटर्स कहे जाने वाले योद्धा जमींदारों की मौज के लिए मरने को लड़ते थे। मैं इटली के रोम आया तो शहर के बीच मौजूद पवित्र देश वैटिकन की यात्रा पर सबसे पहले पहुँचा, फिर मैं उस कब्रगाह में भी गया, जहाँ पहली और दूसरी सदी में मसीहियों के शवों को दफनाया जाता था। जमीन से कई मंजिल नीचे बने इस कब्रगाह की कहानी बेहद दिलचस्प है, लेकिन अभी मैं आपको अपने साथ लिए चलता हूँ उस स्टेडियम में, जिसमें दरअसल रोम शहर का रोम-रोम बसा है।