देश मंथन डेस्क
छत पर भजन

आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार
डिस्क्लेमर - प्राचीन अन्धेर नगरी की ये अति प्राचीन बिजली-कथाएँ अगर किसी को उत्तर-प्रदेश, बिहार और दिल्ली की लगें, तो इसकी जिम्मेदारी तमाम सरकारों की है।
तावान

प्रेमचंद :
छकौड़ीलाल ने दुकान खोली और कपड़े के थानों को निकाल-निकाल रखने लगा कि एक महिला, दो स्वयंसेवकों के साथ उसकी दुकान छेकने आ पहुँची। छकौड़ी के प्राण निकल गये।
आखिरी हीला

प्रेमचंद :
यद्यपि मेरी स्मरण-शक्ति पृथ्वी के इतिहास की सारी स्मरणीय तारीखें भूल गयीं, वह तारीखें जिन्हें रातों को जागकर और मस्तिष्क को खपाकर याद किया था; मगर विवाह की तिथि समतल भूमि में एक स्तंभ की भाँति अटल है। न भूलता हूँ, न भूल सकता हूँ।
कोट मुक्ति

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
प्रेम की बात करते-करते मैं निकल पड़ा हूँ धर्म यात्रा पर। एकदम अचानक, एकदम अप्रायोजित।
मोदी जी, भाषण के आगे क्या है?

कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार:
तो मोदी जी फिर तैयार हो रहे हैं। नहीं, नहीं, विदेश यात्रा के लिए नहीं! लाल किले से अपने दूसरे भाषण के लिए! क्या बोलना है, क्या कहना है? तैयारी हो रही है।
कुम्हरार – खंडहर सुनाते हैं बुलन्द इमारत की दास्ताँ

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
बिहार की राजधानी पटना में अगर इतिहास से रूबरू होना हो तो कुम्हार पहुँचे। कुम्हार के खंडहरों में अतीत की स्मृतियाँ हैं। यहाँ आकर आप इतिहास से साक्षात्कार कर सकते हैं। कुम्हारार वह जगह है जहाँ सम्राट अशोक के शासन काल में तृतीय बौद्ध संगीति हुई थी।
पंडौल – यहाँ पांडवों ने किया था अज्ञातवास

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
पंडौल यानी पांडवों का आवास। मधुबनी जिले के पंडौल के बारे में कहा जाता है कि पांडवों ने यहाँ अज्ञातवास में कुछ वक्त गुजारा था। मैं भवानीपुर गाँव से कोई वाहन नहीं मिलने पर पैदल ही पंडौल के लिए चल पड़ता हूँ। रास्ते में एक बाइक वाले लिफ्ट माँगता हूँ। वह बोले ब्रह्मोतरा तक छोड़ दूंगा। मैं उनके बाइक पर पीछे बैठ जाता हूँ। चार किलोमीटर बाद ब्रह्मोतरा गाँव आ जाता है। यह गाँव सकरी पंडौल मुख्य मार्ग पर स्थित है। यहाँ से पंडौल दो किलोमीटर आगे है।
लांछन

प्रेमचंद :
अगर संसार में ऐसा प्राणी होता, जिसकी आँखें लोगों के हृदयों के भीतर घुस सकतीं, तो ऐसे बहुत कम स्त्री-पुरुष होंगे, जो उसके सामने सीधी आँखें करके ताक सकते ! महिला-आश्रम की जुगनूबाई के विषय में लोगों की धारणा कुछ ऐसी ही हो गयी थी। वह बेपढ़ी-लिखी, गरीब, बूढ़ी औरत थी, देखने में बड़ी सरल, बड़ी हँसमुख; लेकिन जैसे किसी चतुर प्रूफरीडर की निगाह गलतियों ही पर जा पड़ती है; उसी तरह उसकी आँखें भी बुराइयों ही पर पहुँच जाती थीं।
मर्दानगी

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
आज जो कहानी आपको सुनाने जा रहा हूँ, वो पता नहीं क्यों मुझे लग रहा है कि मैंने पहले भी आपको सुनायी है।



आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार
प्रेमचंद :
संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार:
विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार : 




