देश मंथन डेस्क
यादें -9

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
कल की मेरी पोस्ट पर अमित ने कमेंट के साथ एक तस्वीर चस्पा की, जिसमें श्रीमती गाँधी जमीन पर बैठी हैं और सामने पुलिस वाले खड़े हैं। आप में से बहुत से लोगों को यह तस्वीर याद होगी। बहुत से लोगों को समझ में नहीं आया होगा कि आखिर ये तस्वीर कब की है।
यमुना की गन्दगी और हथिनीकुंड बराज

सुशांत झा, पत्रकार :
करीब दो साल पहले ‘यमुना बचाओ अभियान’ के लोगों से मिलना हुआ तो हथिनीकुंड बराज के बारे में जानकारी मिली। वे लोग मथुरा से दिल्ली तक पदयात्रा करते आ रहे थे और पलवल के पास सड़क के किनारे एक स्कूल के मैदान में टेन्ट में विश्राम कर कर रहे थे।
विंडोज का ताजमहल

आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
घर के दरवाजे दादाजी बनवा गये थे, सो चले जा रहे हैं, विंडोज हमारी जनरेशन का काम था, 1998 से अब तक जाने कित्ती बार बदलवानी पड़ीं।
यादें

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
आदमी जिन्दगी का सफर तय करता है। मोटर-गाड़ियाँ सिर्फ सड़कों का सफर तय करती हैं। समय के साथ जिन्दगी के सफर में आदमी बहुत कुछ सीखता है और नया होता जाता है, जबकि सड़क के सफर में मोटर-कार घिसती हैं और पुरानी पड़ती जाती है।
तोते वही बोलें, जो संघ बुलवाये!

कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार:
लोकतन्त्र सुरक्षित है! आडवाणी जी की बातों में बिलकुल न आइए! उन्हें वहम है! इमर्जेन्सी जैसी चीज अब नहीं आ सकती! क्योंकि नरेन्द्र भाई ने देश को ट्वीट कर बताया है कि जीवन्त और उदार लोकतन्त्र को मजबूत बनाना कितना जरूरी है! इसीलिए 'उदार लोकतंत्र' में आडवाणी जैसों की कोई जगह नहीं, जिन्हें लगता हो कि लोकतन्त्र को कुचलने वाली ताकतें आज पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर हैं!
इमरजंसी – एक याद (4)

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
मैंने कहीं पढ़ा था कि एक बार एक अमेरिकी, जो घनघोर नास्तिक था, भारत घूमने आया और यहाँ से वापस जाते हुए वो अपने साथ भगवान की एक मूर्ति लेकर गया। लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ कि ये नास्तिक अमेरिकी भला भारत से भगवान की मूर्ति क्यों खरीद लाया है। लोगों ने उससे पूछा कि भाई, इस मूर्ति में ऐसी क्या बात है।
लौरिया-नंदनगढ़ के बौद्ध स्तूप

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
बेतिया जिले के लौरिया में अशोक स्तंभ के अलावा एक और ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल है नंदनगढ़ का बौद्ध स्तूप। लौरिया चौक से बौद्ध स्तूप बायीं तरफ है। लौरिया बाजार को पार करके गाँव के अन्दर एक विशाल टीला आता है जहाँ पर ये स्तूप स्थित है।
पटना से बेतिया का सफर – चंपारण की धरती को नमन

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
पटना से बेतिया का सफर। पटना के मीठापुर बस स्टैंड से बेतिया के लिए रात्रि सेवा में कई बसें चलती हैं। इनमें एसी और स्लीपर बसें भी हैं। हमारे दोस्त इर्शादुल हक ने बताया था कि पटना से बेतिया के लिए सबसे अच्छी बसें चलती हैं।
इमरजंसी – एक याद (3)

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
मैंने माँ को बहुत कम नाराज होते देखा था। उसकी आवाज तो कभी ऊँची होती ही नहीं थी। लेकिन उस दिन माँ बहुत तिलमिलाई हुयी थी। पता नहीं कहाँ से वो कुछ सुन आयी थी।
पूस की रात

प्रेमचंद :
हल्कू ने आकर स्त्री से कहा- सहना आया है, लाओ, जो रुपये रखे हैं, उसे दे दूँ, किसी तरह गला तो छूटे ।
मुन्नी झाड़ू लगा रही थी। पीछे फिरकर बोली- तीन ही तो रुपये हैं, दे दोगे तो कम्मल कहाँ से आवेगा ? माघ-पूस की रात हार में कैसे कटेगी ? उससे कह दो, फसल पर दे देंगे। अभी नहीं ।



संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
सुशांत झा, पत्रकार :
आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार:
विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
प्रेमचंद :




