Monday, January 12, 2026
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गाल की महबूब ट्रेन-पदातिक एक्सप्रेस

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

पदातिक एक्सप्रेस - सियालदह सेन्यू जलपाईगुड़ी के बीच चलने वाली दार्जिलिंग मेल के बाद एक और ट्रेन। मैं सुबह-सुबह अपने साथी अनवारुल हक के साथ मालदा टाउन स्टेशन पर 12377- पदातिक एक्सप्रेस का इंतजार करता हूँ। पर इंतजार कहाँ। ट्रेन का सुबह 5.40 पहुँचने और 5.45 छूटने का समय है। लेकिन ट्रेन तो आधा घंटे पहले आकर प्लेटफार्म पर लग चुकी है। बीच के एसी कोच के सामने भारी सुरक्षा है।

तीस्ता के साथ गंगटोक का सफर

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

तीस्ता नदी सी तू चंचला... येशुदास के आवाज में ये गीत बचपन से सुन रहा हूँ। सिलिगुड़ी से गंगटोक के रास्ते में सड़क के साथ-साथ लंबे समय तक तीस्ता नदी साथ-साथ चलती है। उछलती-कूदती बलखाती किसी अल्हड़ किशोरी की तरह। चंचल-चपल तीस्ता।

मानो तो गंगा माँ हूँ….

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

गंगा अवतरण की कथा रामायण में मिलती है। अयोध्या के सूर्यवंशी राजा सगर अश्वमेध यज्ञ करने की ठानी। उनके अश्वमेध यज्ञ से डरकर इंद्र ने राक्षस रूप धारण कर यज्ञ के अश्व को चुरा लिया और पाताल लोक में ले जा कर कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया।

गंगा सागर में राजा भगीरथ के हंस

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

दूर तक फैली जलराशि के बीच पानी को काट रास्ता बनाती तेजी से आगे बढ़ती फेरी। फेरी के चारों तरफ मंडराते असंख्य हंसों का झुरमुट। हमारे साथ सफर कर रहे जहाज के यात्री ने बताया कि ये राजा भगीरथ के हंस हैं। कौन राजा भगीरथ, अरे वही जो गंगा को धरती पर लेकर आये थे। गंगा सागर के लिए मूरी गंगा नदी में रोज चलने वाली फेरी के चारों तरफ श्वेत धवल हंस मंडराते हैं। आने जाने वाले श्रद्धालु उन्हें आटे की गोलिया खिलाते हैं। वे गोलियों को लपक लेते हैं। इस तरह पता ही नहीं चलता है कब आठ किलोमीटर का नदी का चौड़ा सफर खत्म हो गया। 

गंगा सागर बार बार

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

सारे तीरथ बार बार गंगा सागर एक बार। बुजुर्गों से ये कहावत बचपन से सुनते आए हैं। आखिर क्या है इस कहावत का राज। एक बुजुर्ग ने ही बताया कि कभी गंगासागर की यात्रा इतनी मुश्किल हुआ करती थी लोग यहाँ अंतकाल में ही जाने की सोचते थे। अगर नहीं लौटे रास्ते में ही ऊपर वाले का बुलावा आ जाए तो भी कोई बात नहीं। पर अब हालात बदल चुके हैं। रास्ता सुगम है और गंगा सागर की यात्रा बार-बार और सालों भर की जा सकती है।

प्राचीन गौड़ मालदा शहर – कभी था ‘लक्ष्मणावती’

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

बंगाल का पुराना शहर गौड़ कभी बंगाल की राजधानी रहा है। गौड़ प्राचीन काल में 'लक्ष्मणावती' मध्यकाल में  'लखनौती'के नाम से जाना जाता था। किसी समय यह संस्कृत भाषा और हिंदू राजसत्ता का बड़ा केंद्र था। गौड़ का सबंध गीत गोविंद के रचयिता जयदेव के अलावा व्याकारणाचार्य हलयुद्ध से रहा है। 

खाइए पाटी सपाटा इसमें भरी है खीर

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

आपने बंगाली मिठाइयों के बारे में तो खूब सुना होगा। पर यह संदेश या रसगुल्ले से कुछ अलग है। बंगाल से बाहर इसके बारे में लोग कम ही जानते हैं। बाहर से देखने में मसाला डोसा जैसा। यूँ कहें कि मिनी डोसा की तरह, पर यह कुछ अलग है। यह लोकप्रिय बंगाली मीठा व्यंजन है। इसे कहते हैं पाटी सपाटा। शाम के नास्ते में गौर बांग्ला यूनीवर्सिटी में जब पाटी सपाटा खाने को मिला तो कौतूहल हुआ। खाया तो काफी सुस्वादु लगा। तब एक और माँग कर खाया।

पूर्वोत्तर जाने वाली ट्रेनों की सुध लें रेलमंत्री जी..

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

रेलवे में यात्री सुविधाओं में सुधार और स्टेशनों को चमकाने की खूब बात की जाती है। पर इसका असर देश की राजधानी दिल्ली से पूर्वोत्तर की ओर जाने वाली ट्रेनों में बिल्कुल नहीं दिखायी देता। लालगढ़ से ढिब्रूगढ़ तक जाने वाली अवध आसाम एक्सप्रेस, आनंद विहार से गुवाहाटी जाने वाली नार्थ इस्ट एक्स, दिल्ली से ढिब्रूगढ़ जाने वाली  ब्रह्मपुत्र मेल, न्यू अलीपुर दुआर तक जाने वाली महानंदा एक्सप्रेस ये सभी दैनिक ट्रेनें उपेक्षा का शिकार हैं। किसी में एलएचबी कोच नहीं लगे। मोबाइल चार्जर दिखायी नहीं देते। ब्रह्मपुत्र मेल के टायलेट में तो जाले लगे दिखायी दिए। मानो कोच की सफाई महीनों से नहीं हुई हो। हालाँकि ये सारी ट्रेनें भारतीय रेल को राजस्व तो खूब देती हैं पर इनसे सौतेला व्यवहार क्यों। यह सवाल इन ट्रेनों में सफर करने वाले बार-बार पूछते हैं।

बैजनाथ पपरोला – कांगड़ा वैली रेल का खास स्टेशन

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

कांगड़ा वैली रेल के 164 किलोमीटर के सफर में आखिरी स्टेशन जोगिंदर नगर से थोड़ा पहले बैजनाथ पपरोला स्टेशन खास है। यह पठानकोट और जोगिंदर नगर के बीच में इस नौरो गेज नेटवर्क का सबसे बड़ा स्टेशन है। इस मायने में भी ये स्टेशन महत्वपूर्ण है कि नैरोगेज की सारी रेल गाड़ियाँ आखिरी स्टेशन जोगिंदर नगर तक नहीं जाती हैं। कई ट्रेनें पपरोला से ही वापस हो जाती हैं। तो कुछ यहीं से बन कर चलती हैं। 

कांगड़ा का स्वाद – लुंगडू का अचार

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

जब भी मैं हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा की वादियों में जाता हूँ तो अचार और चायपत्ती जरूर लाने की कोशिश करता हूँ। कांगड़ा के बाँस के अचार का स्वाद सालों से जुबाँ पर है। पर इस बार यहाँ देखने को मिल लुंगड़ू का अचार । दुकानदार ने बताया यह सर्दिंयों के लिए अच्छा है। सो हमने एक पैकेट खरीद लिया। सर्दियों में बाँस का अचार भी खाना अच्छा रहता है। अब बात लुंगडू की। लुंगडू यानी ( Fiddle head fern)  का अचार कांगड़ा की खास विशेषता है।

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