Tag: पुण्य प्रसून बाजपेयी
दिल्ली 1975 : मेरा खोया बचपन
पुण्य प्रसून बाजपेयी, कार्यकारी संपादक, आजतक :
जैसे ही घुमावदार रिहाइश गलियों के बीच से निकलते हुये मुख्य सड़क पर निकलने को हुआ वैसे ही सामने टैगौर गार्डन केन्द्रीय विद्यालय का लोहे का दरवाजा इतने नजदीक आ गया कि वह सारे अहसास झटके में काफूर हो गये, जिन्हें सहेज कर घर से निकला था।
कश्मीर पर प्रचारक का हठ या नेहरू से आगे मोदी की नीति?
पुण्य प्रसून बाजपेयी, कार्यकारी संपादक, आजतक :
वक्त बदल चुका है। वाजपेयी के दौर में 22 जनवरी 2004 को दिल्ली के नॉर्थब्लाक तक हुर्रियत नेता पहुँचे थे और डिप्टी पीएम लालकृष्ण आडवाणी से मुलाकात की थी। मनमोहन सिंह के दौर में हुर्रियत नेताओं को पाकिस्तान जाने का वीजा दिया गया और अमन सेतु से उरी के रास्ते मुजफ्फराबाद के लिए अलगाववादी निकल पड़े थे।
ट्रैक टू डिप्लोमेसी पर हाफिज का दाग
पुण्य प्रसून बाजपेयी, कार्यकारी संपादक, आजतक :
प्रधानमंत्री मोदी के साथ बाबा रामदेव। और बाब रामदेव के साथ प्रताप वैदिक। यह दो तस्वीरे मोदी सरकार से वेद प्रताप वैदिक की कितनी निकटता दिखलाती है। सवाल उठ सकते हैं।
अमेरिकी चकाचौंध का न्यौता क्या गुल खिलायेगा भारत में?
पुण्य प्रसून बाजपेयी, कार्यकारी संपादक, आजतक :
बजट में ऐसा क्या है कि दुनिया मोदी की मुरीद हो रही है। और बजट के अगले ही दिन दुनिया के सबसे पुराने लोकतांत्रिक देश के राष्ट्रपति का न्यौता दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के पीएम को मिल गया।
संघ का शाह के जरिये राजनीतिक शह-मात का खेल
पुण्य प्रसून बाजपेयी, कार्यकारी संपादक, आजतक :
जिस खामोशी से अमित शाह बीजेपी हेडक्वार्टर में बतौर अध्यक्ष होकर घुसे हैं उसने पोटली और ब्रीफकेस के आसरे राजनीति करने वालो की नींद उड़ा दी है। अध्यक्ष बनने के बाद भी खामोशी और खामोशी के साथ राज्यवार बीजेपी अध्यक्षों को बदलने की कवायद अमित शाह का पहला सियासी मंत्र है।
उच्च शिक्षा को धंधे में बदलकर कौन सा पाठ पढ़ाये सरकार?
पुण्य प्रसून बाजपेयी, कार्यकारी संपादक, आजतक :
विश्व बाजार में भारत की उच्च शिक्षा है कमाई का जरिया
भारत की उच्च शिक्षा को दुनिया के खुले बाजार में लाने का पहला बड़ा प्रयास वाजपेयी की अगुवायी वाली एनडीए सरकार ने किया था।
नेहरु के समाजवाद के छौंक की भी जरूरत नहीं मोदी मॉडल को
पुण्य प्रसून बाजपेयी, कार्यकारी संपादक, आजतक :
बात गरीबी की हो लेकिन नीतियाँ रईसों को उड़ान देने वाली हों। बात गाँव की हो लेकिन नीतियाँ शहरों को बनाने की हो। तो फिर रास्ता भटकाव वाला नहीं झूठ वाला ही लगता है। ठीक वैसे, जैसे नेहरु ने रोटी कपड़ा मकान की बात की।
मुलायम की बिसात पर क्या राहुल क्या मोदी
पुण्य प्रसून बाजपेयी, कार्यकारी संपादक, आजतक :
नेताजी से ज्यादा यूपी की राजनीति कोई नहीं समझता। और सियासत की जो बिसात खुद को पूर्वांचल में खड़ा कर नेताजी ने बनायी है, उसे गुजरात से आये अमित शाह क्या समझे और पुराने खिलाड़ी राजनाथ क्या जाने।
तो अच्छे दिन ऐसे आयेंगे…
पुण्य प्रसून बाजपेयी, कार्यकारी संपादक, आजतक :
सोने का पिंजरा बनाने के विकास मॉडल को सलाम ..
एक ने देश को लूटा, दूसरा देश को लूटने नहीं देगा। एक ने विकास को जमीन पर पहुँचाया। दूसरा सिर्फ विकास की मार्केटिंग कर रहा है।
कभी साजिश के तहत दिल्ली से गुजरात भेजे गये थे मोदी !
पुण्य प्रसून बाजपेयी, कार्यकारी संपादक, आजतक :
'भागवत कथा' के नायक मोदी यूँ ही नहीं बने। क्या नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल के पीछे आरएसएस ही है। क्या आरएसएस के घटते जनाधार या समाज में घटते सरोकार ने मोदी के नाम पर संघ को दाँव खेलने को मजबूर किया।