Tag: रिश्ते
मकान ले लो, मकान

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
मेरे मित्र को एक मकान चाहिए। वैसे दिल्ली में उनके पिता जी ने एक मकान बनवाया है और अब तक वो उसमें उनके साथ ही रह रहे थे। लेकिन कुछ साल पहले उनकी शादी हो गयी और उन्हें तब से लग रहा है कि उन्हें अब अलग रहना चाहिए। मैंने अपने मित्र से पूछा भी कि पिताजी के साथ रहने में क्या मुश्किल है?
रिश्तों में निवेश कीजिए

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
चार साल पहले भी मेरा नाम संजय सिन्हा था। लेकिन तब मैं संजय सिन्हा की जिंदगी जीता था।
रिश्तों के बारे में आत्ममंथन करें

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
मुझे अपने परिचित से पूछना ही नहीं चाहिए था कि तुम्हारी मौसी कहाँ चली गईं? मैंने पूछ कर बहुत बड़ी गलती की और उस गलती का खामियाजा ये है कि आज कुछ लिखने का मन ही नहीं कर रहा है। रात भर सोने का उपक्रम करता रहा, करवटें बदलता रहा। फिर लगा कि आपसे इस बात को साझा कर लूं, शायद मेरा दुख थोड़ा कम हो जाए।
रिश्तों में अच्छाई छाँटना सीखिए

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
कहानी तो सुनानी है शिवानी की। कहानी सुनानी है नीति की और कहानी सुनानी है शुभि की। इतनी ही क्यों, वो ढेर सारी कहानियाँ मुझे आपको सुनानी हैं, जिन्हें मैं जबलपुर से आपके लिए अपने मन के कैमरे में छुपा कर लाया हूँ। अपनी कहानियों की पोटली एक-एक करके रोज खोलूंगा। आप हतप्रभ रह जाएंगे कि उन ढेर सारे मासूमों की कहानी सुन कर, जो कुछ बोल नहीं सकते, पर अपनी कहानी आपको सुनाएंगे। खुद, अपनी जुबान से।
रिश्तों में जरूरी होता है भाव को समझना

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
दो दिनों से प्रेम पर लिख रहा हूँ।
क्या हो गया है मुझे?
एक कटोरी खीर है रिश्तों का पैगाम

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
एक कटोरी खीर की कीमत तुम क्या जानो दीप रानी?
एक कटोरी खीर सिर्फ चावल, दूध और चीनी का मिश्रण भर नहीं। यह दोस्ती की सौगात होती है, यह रिश्तों का पैगाम होता है।
सबसे अभागा वो आदमी जिसके पास रिश्ते नहीं

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
मेरे दफ्तर में काम करने वाली एक महिला ने कल अपना इस्तीफा सौंप दिया। वो मुझसे मिलने आयी थी और बता रही थी कि उसे बहुत अफसोस है कि वो नौकरी छोड़ कर जा रही है, पर मजबूरी है।
मैंने उससे पूछा कि ऐसी क्या मजबूरी है?
सिमरन को जीने का हक है पर जान लेकर नहीं

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
सिमरन अपने प्रेमी के साथ जाने के लिए तड़प रही थी। पर वो अपने पिता को धोखा देकर ऐसा नहीं कर पा रही थी। वो प्रेमी के साथ जीना तो चाहती थी, पर छल से नहीं, इज्जत से। उसने अपने बाऊजी से कातर हो कर कहा था कि वो अपने राज के बिना नहीं जी सकती। बाउजी के लिए बहुत आसान नहीं था खुद को मनाना, पर बेटी की आँखों में प्यार देख कर उन्होंने आखिर में कह ही दिया था, जा बेटी, जी ले अपनी जिन्दगी।
प्यार, स्नेह और मान दें रिश्तों में प्रेम के अंकुर फूटेंगे

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
मैं एक बहू से मिला हूँ। मैं एक सास से मिला हूँ।
दोनों में नहीं बनती। क्यों नहीं बनती मुझे नहीं पता। बहू का कहना है कि सास हर पल उसे नीचा दिखाती हैं।
सास कहती हैं कि बहू उसे पूछती नहीं।
अपने बच्चों को आदमी बनाइए

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
आप मोनू भैया को नहीं जानते।
वो मेरे पिछले मुहल्ले में रहते हैं और मेरी उनसे मुलाकात होती रहती है। अब आप सोच रहे होंगे कि आज मैं सुबह-सुबह मोनू भैया की कहानी क्यों लेकर आपके पास आ गया हूँ।