Sunday, April 14, 2024
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मकान ले लो, मकान

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक : 

मेरे मित्र को एक मकान चाहिए। वैसे दिल्ली में उनके पिता जी ने एक मकान बनवाया है और अब तक वो उसमें उनके साथ ही रह रहे थे। लेकिन कुछ साल पहले उनकी शादी हो गयी और उन्हें तब से लग रहा है कि उन्हें अब अलग रहना चाहिए। मैंने अपने मित्र से पूछा भी कि पिताजी के साथ रहने में क्या मुश्किल है?

कमाई में सफेदी की दरकार

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक : 

बहुत तेज बर्फबारी और कड़ाके की ठंड के बीच मैं अमेरिका के बफैलो एयरपोर्ट पर खड़ा था। मुझे वहाँ से फ्लोरिडा जाना था। आमतौर पर हम कहीं भी आते-जाते हैं तो पहले से विमान का टिकट खरीद चुके होते हैं, होटल और टैक्सी वगैरह की बुकिंग करा चुके होते हैं।

प्रेम पाने का एक मात्र उपाय है कि प्रेम करो

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

इस कहानी को लिखने से पहले मैंने कम से कम हफ्ता भर इंतजार किया है। चाहता तो एक हफ्ता पहले ही पूरी कहानी आपको सुना सकता था। महीना भर पहले मैं अपनी उस परिचित के घर गया था, जिनकी बेटी की शादी कुछ ही दिन पहले हुई है। शादी खूब धूम-धाम से हुई थी, लेकिन शादी के बाद ससुराल में अनबन शुरू हो गयी। जरा-जरा सी बात पर झगड़े होने लगे। मेरे पास लड़की की माँ का फोन आया था कि सोनू की उसके ससुराल में नहीं बन रही। 

प्यार दो, प्यार लो

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

जबलपुर जाने का मतलब है कहानियों के संसार की यात्रा पर निकलना। एक कहानी खत्म हुई नहीं कि दूसरी शुरू। अब वहाँ कदम संस्था वालों ने इतने पेड़ लगा दिए हैं कि प्रकृति जबलपुर की मिट्टी चूमने लगी है। आसमान बादलों को मुहब्बत का पैगाम लेकर धरती के पास भेजने लगा है। ऐसा ही परसों हुआ था जब दिल्ली से उड़ा विमान जबलपुर एयरपोर्ट पर उतरने से घबराता रहा कि वहाँ तो धरती से मिलने बादल नीचे उतर आये हैं। 

भाई की आँखों में चमक और बहन की आँखों में प्यार

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

माँ तीन दिनों के लिए पिताजी के साथ बाहर गई थी। मैं बिना माँ के एक दिन नहीं रह सकता था। माँ ने जाते हुए मुझसे दो साल बड़ी बहन को निर्देश दिया था कि संजू का ख्याल रखना। बहन चुपचाप खड़ी थी। 

प्रेम, नफरत, तन्हाई और मिलन

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

सुबह जब नींद खुले तो अपने भीतर झाँकिए। मन की खिड़िकियों से देखिए कि कहीं आप अकेले तो नहीं। 

प्रेम रहित विवाह

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

कल देवघर पहुँचा। भोलेनाथ के दर्शन किए।

फिर सारे रास्ते येलेना की कहानी पर आपके कमेंट पढ़ता रहा। सोचता रहा उस फिल्मकार के बारे में जिसने 'प्यासा' और 'कागज' के फूल जैसी फिल्में बनाई थीं। दोनों फिल्में फ्लॉप साबित हुई थीं।

प्रेम करना नहीं होता, उसे बस जीना होता है

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

एक नौजवान ने मुझसे गुहार लगायी है कि मैं उसकी समस्या को ध्यान से समझूं और फिर उसका हल बताऊं। उसने मुझ पर लानत भेजी है कि मैं सिर्फ सास-बहू, पति-पत्नी और आदमी से आदमी के रिश्तों की कहानियाँ लिखता हूँ। और जिस दिन खुश होता हूँ, अपनी प्रेम कहानी लिख देता हूँ। पर आज की नयी पीढ़ी की समस्या की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता।

जिन्दगी अपनी पसंद की होनी चाहिए

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

बेटे ने जिद पकड़ ली थी कि उसे डायनासॉर वाला खिलौना चाहिए। 

डायनासॉर वाला खिलौना बच्चों की पसंद बना हुआ था। वो बैट्री से चलता था, कुछ दूर चल कर रुकता और फिर मुँह से अजीब सी आवाज निकाल कर धुआँ छोड़ता। 

डॉर्लिंग कह कर हाल पूछिए, प्यार का जोड़ टूटेगा नहीं

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

कल दफ्तर में काम अधिक था। घर पहुँचने में देर हो गयी। हो सकता है कि पत्नी मन ही मन नाराज भी हो रही हो कि मैं सारा दिन दफ्तर में गुजार देता हूँ और इस चक्कर में दिल्ली के सभी मॉल्स में जो सेल लगी है, उसमें उसे नहीं ले जा पा रहा।

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