Wednesday, March 18, 2026
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गलती चाहे जिससे हो, सजा मिलती ही है

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक : 

"हे राम! मैं प्रचेता का दसवाँ पुत्र रत्नाकर, जिसने ‘मरा-मरा’ जपने में खुद को भुला दिया और जिसके शरीर को चीटिंयों ने बांबी समझ कर अपना परिवार बसा लिया, जिसे उन बांबियों की बदौलत वाल्मिकी नाम मिला है, वो आपके सामने हाथ जोड़े खड़ा है।

हे राम! मेरे पिता वशिष्ठ, नारद और भृगु के भाई हैं।

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