Sunday, March 29, 2026
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प्यार के बीज

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

मेरी तीन नानियाँ थीं। तीन नहीं, चार। 

चार में से एक नानी मेरी माँ की माँ थी और बाकी तीन मेरी माँ की चाचियाँ थीं। माँ तीनों चाचियों को बड़की अम्मा, मंझली अम्मा और छोटकी अम्मा बुलाती थी, इसलिए माँ की तीनों अम्माएँ मेरी बड़की नानी, मंझली नानी और छोटकी नानी हुईं। बचपन में मुझे ऐसा लगता था कि चारों मेरी माँ की माँएं हैं और इस तरह मेरी चार नानियाँ हैं। पर मैंने पहली लाइन में ऐसा इसलिए लिखा है कि मेरी तीन नानियाँ थीं, क्योंकि मेरी माँ की माँ के इस दुनिया से चले जाने के बाद मुझे अपनी उन तीन नानियों के साथ रहने का ज्यादा मौका मिला, जो माँ की चाचियाँ थीं। 

आज के तुलसी

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

“राम जी अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र थे। बहुत बहादुर थे। सभी लोग उन्हें बहुत प्यार करते थे।”

जीवन का मंदिर

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

दुनिया भर के धर्म प्रचारकों, अपने दुश्मनों को मुँहतोड़ जवाब देने के लिए व्याकुल वीर पुरुषों, अपने-अपने मजहब के लिए दूसरों के सिर कलम कर देने का दम दिखाने वालों, चंद रुपयों के लिए किसी के दिल पर नश्तर चला देने वाले महान मनुष्यों, आओ, मेरे साथ तुम जिन्दगी के उस सत्य को देखो, जिसे देख कर हजारों साल पहले सिद्धार्थ नामक एक राजकुमार सबकुछ छोड़ कर संन्यासी बन गया था।

मन की कमजोरी

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

हाथी वाली कहानी आप सबने बचपन में ही सुन ली होगी। 

मैं जानता हूँ कि पहली पंक्ति पढ़ कर एक क्षण में आपके जेहन में न जाने हाथियों की कितनी कहानियाँ कौंध पड़ी होंगी।

जहाँ आकर मौत भी मुस्काराती है

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

आज मैं आपको जबलपुर में बैठ कर अनिता की कहानी सुनाऊँगा। फिर सुनाऊँगा फेसबुक पर किसी की भेजी वो कहानी जिसका रिश्ता सीधे-सीधे अनिता की कहानी से जुड़ा है। 

जिन्दगी की उम्मीद

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

आज मुझे मिलना है जबलपुर के विराट हॉस्पिस में कैंसर के उन मरीजों से जिन्हें डॉक्टरों ने कह दिया है कि अब दवा नहीं सिर्फ दुआ का आसरा है। 

रिश्तों की तलाश

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

आज आपको बहुत से सवालों के जवाब मिल जाएँगे। 

जीने का संकल्प

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

“जब विकल्प की सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब मानव संकल्प का उदय होता है।”

जन्मों को होता है पति-पत्नी का रिश्ता

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

पांडव लाक्षागृह में बतौर मेहमान बुलाए गये थे और जब उसमें आग लग गयी तो वो फँस गये थे। कहीं से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था। अब कोई करे भी तो क्या करे। लाक्षागृह धू-धू कर जल रहा था। युधिष्ठिर विचलित थे। अब इसमें से कोई कैसे बाहर निकले। सबकी आँखों में यही सवाल था। 

सलाम सचिन

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

शायद पच्चीस साल पुरानी बात है, हमारे अखबार के संपादक प्रभाष जोशी क्रिकेट का मैच देखने न्यूजीलैंड गये हुए थे। वहाँ से मैच का आँखों देखा हाल वो रोज जनसत्ता में छाप रहे थे। तब मैं जनसत्ता में उप संपादक के पद पर काम करने लगा था।

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