देश मंथन डेस्क
हमें मारोंगे तो हम कुछ नहीं कहेंगे

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
आइए, आज आपको एक ऐसी कहानी सुनाता हूँ, जिसे याद करके मेरी रूह काँप जाती है।
महिलाओं में ईश्वर का निवास है

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
जाती हुई सर्दी बहुत बुरी होती है। जाते-जाते छाती से चिपक गयी है।
क्या शिक्षक हार रहे हैं?

संजय द्विवेदी, अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय :
कई बार लगता है कि विचारधारा राष्ट्र से बड़ी हो गयी है। पार्टी, विचारधारा से बड़ी हो गयी है, और व्यक्ति पार्टी से बड़ा हो गया है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में रहते हुए, जैसी बेसुरी आवाजें शिक्षा परिसरों से आ रही हैं, वह बताती हैं कि राजनीति और राजनेता तो जीत गये हैं, किंतु शिक्षक और विद्यार्थी हार रहे हैं। समाज को बाँटना, खंड-खंड करना ही तो राजनीति का काम है, वह उसमें निरंतर सफल हो रही है। हमारे परिसर, विचारधाराओं की राजनीति के इस कदर बंधक बन चुके हैं, कि विद्यार्थी क्या, शिक्षक भी अपने विवेक को त्याग कर इसी कुचक्र में फँसते दिख रहे हैं।
गुरुद्वारा – किला आनंदगढ़ साहिब

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
आनंदपुर साहिब में रेलवे स्टेशन से बाहर निकलने के बाद सबसे पहले किला आनंद गढ़ साहिब में पहुँचा जा सकता है। यह किला आनंदपुर साहिब शहर के बीच में स्थित है। दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने इलाके में पाँच किलों की स्थापना की थी, आनंद गढ़ साहिब उनमें से एक है। यह मुख्य गुरुद्वारा केशगढ़ साहिब से 800 मीटर की दूरी पर स्थित है। गुरु गोबिंद सिंह जी को 1689 से 1705 के बीच मुगलों और पहाड़ के राजाओं से कई युद्ध लड़ने पड़े थे।
अपनी विचारधारा के बारे में दो टूक

अभिरंजन कुमार :
मैं जब सड़क पर पैदल चलता हूँ या साइकिल चलाता हूँ, तो बाएँ चलता हूँ, ताकि आती-जाती गाड़ियों से अपनी रक्षा कर सकूँ। जब कार चलाता हूँ, तो दाएँ चलता हूँ, ताकि आते-जाते पैदल या साइकिल यात्रियों को मेरी वजह से परेशानी न हो। जहाँ कहीं दाएँ या बाएँ मोड़ हो और मुझे सीधा जाना हो, तो गाड़ी बीच की लेन पर ले आता हूँ।
रिश्ते जरूर बनाये, अकेलापन से बड़ी कोई सजा नहीं

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
मन में हजार कहानियाँ उमड़ती घुमड़ती रहीं।
कल मुंबई में कुछ फोन चोरों को लोगों ने पकड़ कर चलती ट्रेन में नंगा करके बेल्ट से पीटा, मोबाइल से उनकी तस्वीरें उतारीं, तस्वीरें मीडिया तक पहुँचाई गयीं और इस तरह हमने देखा और दिखाया कि हम किस ओर बढ़ चले हैं।
खैर, सुबह-सुबह बुरी खबरें मुझे विचलित करती हैं।
अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
मेरे जैसे पत्रकार नहीं होने चाहिए। ऐसे पत्रकार बेकार होते हैं, जो मालदा की घटना पर, सियाचीन के जाबांजों की मौत पर, सुलग रहे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पर अपनी कलम नहीं भांजते। ऐसे पत्रकारों पर लानत है। संजय सिन्हा से कई लोगों ने गुहार लगायी है कि आप कुछ ऐसा क्यों नहीं लिखते, जिससे आपकी देशभक्ति जाहिर हो।
रिश्तों का पाठ

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
मेरी माँ की तबियत जब बहुत खराब हो गयी थी तब पिताजी ने मुझे पास बिठा कर बता दिया था कि तुम्हारी माँ बीमार है, बहुत बीमार। मैं आठ-दस साल का था। जितना समझ सकता था, मैंने समझ लिया था। पिताजी मुझे अपने साथ अस्पताल भी ले जाते थे। उन्होंने बीमारी के दौरान मेरी माँ की बहुत सेवा की, पर उन्होंने मुझे भी बहुत उकसाया कि मैं भी माँ की सेवा करूं।
खुल कर सामने आएं ना?

देवेन्द्र शास्त्री :
हमने आरएसएस और दक्षिण पंथियों का झूठ और छलावा पढ़ा और देखा है। वो पचास साल तक सत्ता के गलियारों में झाँक भी नहीं सके। अब जाकर उन्हें समझ में आयी कि सच स्वीकार किए बिना काम नहीं चलने वाला। तो कुछ सच उन्होंने स्वीकार कर लिए जैसे गाँधी, पटेल को अपना लिया, नेहरु के योगदान को भी मानने लगे हैं। और फिलहाल गोडसे को त्याग दिया। हाँ लेकिन मंदिर मस्जिद, हिंदू-मुसलमान, अदानी-अंबानी चल रहा है। मजदूर और किसान आज भी उनकी प्राथमिकता पर नहीं है। ठीक है, दो साल और हैं, देखते हैं क्या करते है। पर यहाँ मैं उनकी बात नहीं कर रहा। वो तो पहले से कुख्यात हैं, जैसे भी हैं, सामने हैं। ढका-छुपा अब कुछ नहीं। मैं बात कर रहा हूँ तथाकथित सेकुलर्स की।
आज की मस्ती कल भारी पड़ेगी

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
मेरी आज की कहानी बड़ों से ज्यादा बच्चों के लिए है। अब बच्चे तो मेरे दोस्त हैं नहीं, तो बच्चों के पापाओं और बच्चों की मम्मियों से मैं अनुरोध करूँगा कि मेरी आज की पोस्ट वो अपने बच्चों को जरूर सुनाएँ।



संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
संजय द्विवेदी, अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय :
विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
अभिरंजन कुमार :
देवेन्द्र शास्त्री :




