Saturday, March 28, 2026

देश मंथन डेस्क

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रिश्तों का पाठ

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :

बचपन में मुझे चिट्ठियों को जमा करने का बहुत शौक था। हालाँकि इस शौक की शुरुआत डाक टिकट जमा करने से हुई थी। लेकिन जल्द ही मुझे लगने लगा कि मुझे लिफाफा और उसके भीतर के पत्र को भी सहेज कर रखना चाहिए। इसी क्रम में मुझे माँ की आलमारी में रखी उनके पिता की लिखी चिट्ठी मिल गयी थी। मैंने माँ से पूछ कर वो चिट्ठी अपने पास रख ली थी। बहुत छोटा था, तब तो चिट्ठी को पढ़ कर भी उसका अर्थ नहीं पढ़ पाया था, लेकिन जैसे-जैसे बड़ा होता गया बात मेरी समझ में आती चली गयी। 

कानूनी कुमार

प्रेमचंद :

मि. कानूनी कुमार, एम.एल.ए. अपने आँफिस में समाचारपत्रों, पत्रिकाओं और रिपोर्टों का एक ढेर लिए बैठे हैं। देश की चिन्ताओं से उनकी देह स्थूल हो गयी है; सदैव देशोद्धार की फिक्र में पड़े रहते हैं। सामने पार्क है। उसमें कई लड़के खेल रहे हैं। कुछ परदेवाली स्त्रियाँ भी हैं, फेंसिंग के सामने बहुत-से भिखमंगे बैठे हैं, एक चायवाला एक वृक्ष के नीचे चाय बेच रहा है। कानूनी कुमार (आप-ही-आप) देश की दशा कितनी खराब होती चली जाती है। गवर्नमेंट कुछ नहीं करती। बस दावतें खाना और मौज उड़ाना उसका काम है। (पार्क की ओर देखकर)

भगवान बचाये, भगवान से

आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :

पुरुषों के श्रृंगार प्रसाधन-इस विषय पर सेमिनार था। 

‘क्रिकेट दबंग’ फारुख की गुंडई !!

पद्मपति शर्मा, वरिष्ठ खेल पत्रकार :

नब्बे के दशक की शुरुआत में कश्मीरी पंडितों को घाटी से खदेड़ने के लिए कथित रूप से जिम्मेदार जम्मू एवं कश्मीर के तत्कालीन मुख्य मन्त्री और वंशवादी राजनीति के देश में चुनिंदा पहरुओं में एक फारुख अब्दुल्ला को लगता है कि अच्छे दिन बीत गये और आजादी बाद से ही राज्य को लूटने वाले इस शख्स ने राज्य की क्रिकेट का भी कम बेड़ा गर्क नहीं किया। 

जीवन और मृत्यु का पाठ पढ़ाने वाले गुरु श्रीकृष्ण

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :

कभी नहीं,

इस आत्मा को, 

खण्ड-खण्ड कर सकते हैं 

हथियार। 

कभी नहीं,

इस आत्मा को 

जला सकती है

अग्नि।

कभी नहीं

भी 

इस आत्मा को

भिगो सकता है, 

जल।

कभी नहीं, 

सुखा सकती है, 

वायु।

***

आरक्षण के खिलाफ हवाई घोड़े!

कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार :

क्या यह महज संयोग ही है कि हार्दिक पटेल ने आरक्षण का मुद्दा तभी उठाया, जब जातिगत जनगणना के पूरे आँकड़े मोदी सरकार दबाये बैठी है? सवाल पर सोचिए जरा! जातिगत जनगणना के शहरी आँकड़े तो अभी बिलकुल गुप्त ही रखे गये हैं, और आरक्षण का बड़ा ताल्लुक शहरी आबादी से ही है। लेकिन केवल ग्रामीण आँकड़ों का भी जो जरा-सा टुकड़ा सरकार ने जाहिर किया है, उसमें भी ओबीसी के आँकड़े उसने पूरी तरह क्यों छिपा लिये? यह नहीं बताया कि कितने ओबीसी हैं? क्यों? ओबीसी के आँकड़े बिहार चुनाव में मुद्दा बन जाते? बनते तो क्यों? ओबीसी के आँकड़ों में ऐसा क्या है, जिसे सरकार अभी सामने नहीं आने देना चाहती! इसलिए क्या यह वाकई संयोग है कि ठीक इसी समय गुजरात से ओबीसी आरक्षण को चुनौती दी जाती है?

जीवन कुछ नहीं होता

‪‎संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :

देखो मैंने देखा है ये एक सपना, फूलों के शहर में है घर अपना 

गृह-नीति

प्रेमचंद :

जब माँ, बेटे से बहू की शिकायतों का दफ्तर खोल देती है और यह सिलसिला किसी तरह खत्म होते नजर नहीं आता, तो बेटा उकता जाता है और दिन-भर की थकान के कारण कुछ झुँझलाकर माँ से कहता है, 

मुगल सल्तनत की कहानी सुनाता लाल किला

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार : 

लाल किला यानी सदियों से इतिहास के पन्नों में कई तरह के उतार-चढ़ाव का साक्षी। यमुना नदी के किनारे बना ये किला तभी दिखायी देता है जब आपकी ट्रेन पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन में प्रवेश करने वाली होती है। अगर कोई दिल्ली घूमने आता है तो वह लाल किला जरूर जाता है।

दशरथ माँझी ने की थी गया से दिल्ली तक पदयात्रा

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार : 

पहाड़ का सीना चीर कर सड़क बनाने वाले दशरथ माँझी के जीवन पर अत्यंत खूबसूरत फिल्म बनी है माँझी द माउंटेन मैन। माँझी ने अपने जीवन काल में एक बार रेलवे ट्रैक से होते हुए पैदल ही गेहलौर से दिल्ली की 1400 किलोमीटर की दूरी तय की थी।