देश मंथन डेस्क
क्यों ‘आरक्षण-मुक्त’ भारत का नारा?

कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार :
गुजरात के पाटीदार अनामत आन्दोलन (Patidar Anamat Andolan) के पहले हार्दिक पटेल को कोई नहीं जानता था। हालाँकि वह पिछले दो साल में छह हजार हिन्दू लड़कियों की 'रक्षा' कर चुके हैं! ऐसा उनका खुद का ही दावा है! बन्दूक-पिस्तौल का शौक हार्दिक के दिल से यों ही नहीं लगा है।
गिरफ्तारी और सजा

असग़र वजाहत:
यह कोई 1982-83 की बात है। मैं दिल्ली की एक लोकल बस मेँ चढ़ा। बस के कंडक्टर ने कहा, जाकर बैठ जाओ टिकट देता हूँ।’ लेकिन कंडक्टर टिकट देना भूल गया ओर मैं लेना भूल गया। इतनी देर मेँ बस के ऊपर छापा पड़ा और मुझे टिकट न होने की वजह से गिरफ्तार करके पास खड़ी मोबाइल कोर्ट में बंद कर दिया गया।
डामुल का कैदी

प्रेमचंद :
दस बजे रात का समय, एक विशाल भवन में एक सजा हुआ कमरा, बिजली की अँगीठी, बिजली का प्रकाश। बड़ा दिन आ गया है। सेठ खूबचन्दजी अफसरों को डालियाँ भेजने का सामान कर रहे हैं। फलों, मिठाइयों, मेवों, खिलौनों की छोटी-छोटी पहाड़ियाँ सामने खड़ी हैं।
ताकतवर को चाहिए आरक्षण

आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
पटेल असमर्थता या कमजोरी के आधार पर नहीं, ताकत के आधार पर आरक्षण माँग रहे हैं, संदेश साफ है कि हमारे वोट चाहिए, तो हमारी बात सुननी ही होगी, माँग नाजायज या जायज है, यह मसला नहीं है। हम ताकतवर जाति हैं, तो बात सुननी होगी।
आओ, हिन्दी की भी सोच लें भाई

संजय द्विवेदी, अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय :
सितंबर का महीना आ रहा है। हिन्दी की धूम मचेगी। सब अचानक हिन्दी की सोचने लगेंगें। सरकारी विभागों में हिन्दी पखवाड़े और हिन्दी सप्ताह की चर्चा रहेगी। सब हिन्दीमय और हिन्दीपन से भरा हुआ। इतना हिन्दी प्रेम देख कर आँखें भर आएँगी। वाह हिन्दी और हम हिन्दी वाले। लेकिन सितंबर बीतेगा और फिर वही चाल जहाँ हिन्दी के बैनर हटेंगें और अंग्रेजी का फिर बोलबाला होगा। इस बीच भोपाल में विश्व हिन्दी सम्मेलन भी होना है। यहाँ भी दुनिया भर से हिन्दी प्रेमी जुटेगें और हिन्दी के उत्थान-विकास की बातें होंगी। ऐसे में यह जरूरी है कि हम हिन्दी की विकास बाधा पर भी बात करें। सोचें कि आखिर हिन्दी की विकास बाधाएँ क्या हैं?
आरक्षण@पटेल

सुशांत झा, पत्रकार :
पटेलों को आरक्षण मिलने से सबसे ज्यादा दिक्कत किसे होनी चाहिए? जाहिर है, वर्तमान पिछड़ों को। और जाटों को आरक्षण मिलने से? उसमें भी वर्तमान पिछड़ों को दिक्कत होनी चाहिए कि कोई मजबूत जाति उसके हिस्से में सेंधमारी करने आ रही है। लेकिन पिछड़ों का कोई मजबूत प्रतिरोध सामने नहीं है। सिवाय एकाध फेसबुकिया विचारकों के पिछड़ों को अपने हितों की कोई चिन्ता नहीं है!
बेटी ‘उजाला’ और बहू ‘बेरहम’

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
माँ ने बताया था कि जिस दिन मेरा जन्म हुआ था, उस दिन खूब बारिश हो रही थी। सुबह के पांच बजे घर में थाली पर हँसुए की झंकार गूंजी थी। मैं याद करने पर आऊँ तो सब कुछ याद आ सकता है। लेकिन मैं आज अपने जन्मदिन को याद नहीं करना चाहता।
जीवन का शाप

प्रेमचंद :
कावसजी ने पत्र निकाला और यश कमाने लगे। शापूरजी ने रुई की दलाली शुरू की और धन कमाने लगे? कमाई दोनों ही कर रहे थे, पर शापूरजी प्रसन्न थे; कावसजी विरक्त। शापूरजी को धन के साथ सम्मान और यश आप-ही-आप मिलता था। कावसजी को यश के साथ धन दूरबीन से देखने पर भी दिखायी न देता था; इसलिए शापूरजी के जीवन में शांति थी, सह्रदयता थी, आशीर्वाद था, क्रीड़ा थी।
मुसलिम हलचल के चार कोण!

कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार :
अल्पसंख्यक राजनीति में नयी खदबदाहट शुरू हो गयी है! एक तरफ हैं संघ, बीजेपी और एनडीए सरकार, दूसरी तरफ है मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड, तीसरा कोण है मजलिस इत्तेहादुल मुसलिमीन के असदुद्दीन ओवैसी का और चौथा कोण है मुसलिम महिलाओं की एक संस्था भारतीय मुसलिम महिला आन्दोलन।
अफसोस

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
मैंने कल लिखा था कि दिल्ली के मैक्स अस्पताल में एक बेटी अपने पिता के ऑपरेशन के बाद उनकी तस्वीर अपने भाई को भेजना चाहती थी, जो अमेरिका में रहता है। उसका सोचना था कि भाई वहाँ परेशान होगा और पिता की तस्वीर देख कर बहुत खुश होगा। पर डॉक्टर ने उसे पिता से बात कराने की ही अनुमति दे दी।



कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार :
असग़र वजाहत:
प्रेमचंद :
आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
संजय द्विवेदी, अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय :
सुशांत झा, पत्रकार :
संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :




