राजीव रंजन झा :
कनिका कपूर याद है? इसलिए पूछ रहा कि जनता की याददाश्त बहुत छोटी होने की बात कही जाती है।
लेकिन ताजा बात है, तो कुछ-कुछ याद होगा ही। गायिका कनिका कपूर। बेबी डॉल वाली!
वह विदेश से भारत आयी, एकांतवास का निर्देश नहीं मानी, पार्टियों में व्यस्त रही, सैंकड़ों लोगों के संपर्क में आयी। उनमें कई बड़े नेताओं ने भी शिरकत की थी। पता चला कि कनिका कपूर को कोरोना वायरस का संक्रमण है, हड़कंप मच गया। अस्पताल में भर्ती होने के बाद भी मोहतरमा वीआईपी नखरे दिखाती रहीं। गनीमत रही कि उसके संपर्क में आने वाले सैंकड़ों लोगों में से किसी को कोरोना संक्रमण नहीं हुआ। ऐसा कैसे संभव हुआ, पता नहीं। लेकिन यही सच है कि उसने किसी को कोरोना संक्रमण नहीं दिया।
यह सब बात आपको पता ही है, आप इतने भी भुलक्कड़ नहीं होंगे, तो सब याद ही होगा। याददाश्त वाली बात तो वैसे ही कह दी, वरना लोग आज कल खोद-खोद कर पाँच साल दस साल पुरानी बातें निकालते रहते हैं।
तो फिर यह सब कहानी क्यों कह रहा? इसलिए, कि मोहतरमा को 30 अप्रैल को थाने पहुँचने के लिए बोला गया है। क्यों? इसलिए, कि भले ही उनसे किसी को कोरोना वायरस नहीं लगा, पर खतरा तो था ही। उन्होंने जो काम किया, वह तो दूसरों की जान खतरे में डालने वाला था ही। इसलिए उन पर आगे कार्रवाई होगी।
मुझे इतने दिनों में ऐसा कोई नहीं दिखा, जो बोल रहा हो कि कनिका कपूर को हिंदू होने के चलते प्रताड़ित किया जा रहा है। किसी ने नहीं कहा कि उसकी निंदा कलाकारों की छवि खराब करने का अभियान है। कोई यह भी नहीं बोल रहा कि चलो यार जाने दो, उसके चलते किसी को कोरोना हुआ तो नहीं। किसी ने नहीं कहा कि सीधे उसका नाम लेने से उसका नाम खराब हो रहा है, इसलिए उसे फलाना सोर्स या ढिमकाना सोर्स कहा जाये। वैसे तो वह सोर्स बनी ही नहीं, क्योंकि उससे किसी को कोरोना फैला नहीं।
मगर इतने दिनों में ऐसा कोई दिन नहीं गुजरा, जब अनगिनत लोगों ने यह न कहा हो कि तबलीगी जमात वालों को मुसलमान होने के चलते निशाना बनाया जा रहा है। ऐसा कोई दिन नहीं बीता, जब यह न कहा गया हो कि तबलीगियों के बहाने मुसलमानों की छवि खराब की जा रही है।
और यह हाल तब है, जब दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल जाने कितनी बार साफ बोल चुके हैं कि तबलीगियों के चलते दिल्ली की हालत ज्यादा खराब हो गयी, वरना स्थिति काफी अच्छी रहती। जब तक जमात के लोगों और उनके संपर्क में आये लोगों के बीच संक्रमण के आँकड़े दिये जा रहे थे, तब तक दिल्ली समेत कई राज्यों में कोरोना मरीजों की आधे से ज्यादा संख्या इन्हीं की थी।
खुद उन तबलीगियों में से कितने ही लोग कोरोना संक्रमण के चलते मर चुके हैं। केवल भारत में ही नहीं, तबलीगी जमात मरकज में हिस्सा लेने के बाद अपने देश लौटे विदेशी मौलानाओं के भी मरने की खबरें आयी हैं। संक्रमित होने वालों की संख्या तो हजारों में है। यह संख्या इतनी बढ़ने लगी कि हमारे देश के सेक्युलरिज्म को शर्म होने लगी और कोरोना मरीजों की संख्या में तबलीगी जमात की संख्या अलग से बताने पर रोक लगा दी गयी। कभी उस आँकड़े को सिंगल सोर्स कहा गया, कभी स्पेशल ऑपरेशंस कहा गया, और अब तो यह संख्या बतायी ही नहीं जा रही।
तबलीगी जमात की आलोचना करने वालों ने हमेशा इस संगठन का ही नाम लिया, पूरे समुदाय को दोषी नहीं बताया। लेकिन ऐसा लगता है कि इस समुदाय के अधिसंख्य लोगों ने, और देश के सेक्युलिबरल ब्रिगेड ने तबलीगी जमात की आलोचना को मुस्लिम समुदाय की आलोचना का समानार्थी बना दिया। ऐसा करके इस जमात को मुसलमानों का समानार्थी किसने बनाया? असल में सांप्रदायिक रवैया किन लोगों का है?
एक और अहम सवाल है जिस पर कम चर्चा हुई। दिल्ली में निजामुद्दीन स्थित मरकज से करीब ढाई हजार तबलीगियों को निकाले जाने से पहले भी सैंकड़ों-हजारों जमाती इस मरकज से बाहर निकल कर देश के लगभग हर राज्य में फैल गये थे। जो लोग कहते हैं कि यह तबलीगी जमात मुसलमानों के बीच बहुत कम पैठ रखती है, उसकी हरकतों को पूरे समुदाय से जोड़ कर देखना ठीक नहीं है, उनकी इस बात को सिर-माथे रखते हुए भी यह तो पूछना बनता है कि देश भर की सैंकड़ों मस्जिदों में इस जमात के लोगों को छिपने की जगह कैसे मिली?
कुछ लोग बार-बार यह कुतर्क भी दोहराते रहे हैं कि तबलीगी छिपे हुए नहीं थे, बल्कि फँसे हुए थे। यह वाहियात तर्क है। बार-बार अपील करने के बाद भी सामने नहीं आने वाले लोगों को छिपा हुआ ही कहा जा सकता है। फँसा हुआ व्यक्ति तो पहली पुकार में ही खुद सामने बाहर आ जाता है कि चलो, मदद करने वाले आ गये।
यहाँ बात शुरू हुई थी कनिका कपूर से। किसी एक व्यक्ति में भी संक्रमण नहीं फैलाने वाली कनिका कपूर को थाने जा कर अपने विरुद्ध कार्रवाई का सामना करना है। कई मौतों की जिम्मेदार और हजारों व्यक्तियों में जान-बूझ कर संक्रमण फैला चुकी तबलीगी जमात के लोगों के लिए हमें बताया जा रहा है कि हमें उन पर गर्व करना चाहिए। क्यों? क्योंकि उनमें से दो-चार लोगों ने प्लाज्मा दान करने की दयानतदारी दिखायी है।
ठीक है। देश में कोरोना वायरस की विभीषिका को भयानक रूप से बढ़ाने और लॉकडाउन को 40 दिन बाद भी नहीं खोले जा सकने की स्थिति पैदा करने वाले तबलीगी जमातियों को हम 130 करोड़ भारतीय इस दयानतदारी के लिए सलाम करते हैं।
(देश मंथन, 27 अप्रैल, 2020)