नहीं संभले तो मिट जायेंगे

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श्रीकांत प्रत्यूष, संपादक, प्रत्यूष नवबिहार :

शनिवार को भूकंप के झटके ने नेपाल में बड़े पैमाने पर तबाही मचायी। हजारों भवन ध्वस्त हो गये और 4,700 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। इस भूकंप के झटके को पूरे उत्तर भारत में और सबसे ज्यादा बिहार में महसूस किया गया। बिहार में तीस से ज्यादा लोग मारे गये।

भूकंप का समय दोपहर का था इसलिए लोगों करीब से महसूस किया। भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 7.5 मापी गयी यानी इसमें बड़े पैमाने पर तबाही मचाने की क्षमता थी। इससे पहले भी भारत में कई विनाशकारी भूकंप आ चुके हैं। 2001 में गुजरात में आये भूंकप में 20,000 लोग और 2005 में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में आए भूकंप में 1,30,000 लोग मारे गये थे। जहाँ तक बिहार की बात है सबसे ज्यादा खतरनाक भूकंप जोन में आता है। बिहार में 1934 में आये भूकंप में 30,000 लोग मारे गये थे।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आपदा को लेकर ज्यादा सचेत रहते हैं। जैसे ही उन्हें बिहार में भूकंप आने की खबर मिली अपने दिल्ली के सारे कार्यक्रम रद्द कर तुरंत पटना पहुँच गये। राहत बचाव कार्य युद्ध स्तर पर चलाने का आदेश दे दिया। मारे गये लोगों के परिजनों को चार-चार लाख मुआवजा देने का ऐलान भी कर दिया ।

लेकिन सवाल ये उठता है कि कब तक सरकारें एहतियाती कदमों को नजर-अंदाज करती रहेंगी? कब तक भूकंप से मरने वालों को मुआवजा देकर कर्तव्यों का निर्वाह करती रहेंगी? भूकंप से सबसे ज्यादा खतरा बिहार को है फिर क्यों बिहार की जनता और सरकार भूकंप को लेकर ज्यादा गंभीर नहीं है? आपदा प्रबंधन विभाग के अधिकारियों की नींद भूकंप का झटका आने के बाद खुली और आज वो भूकंप की तीव्रता जानने के लिए भूकंप तीव्रता मापी यन्त्र लगाने के लिए जमीन खोदते नजर आये। ये तो आग लगने पर कुआँ खोदने वाली बात हुई। यह तो समय आने पर ही पता चलेगा कि भूकंप से मचने वाली तबाही से निबटने के लिए आपदा प्रबंधन विभाग पहले से तैयार है भी या नहीं या फिर आपदा आने के बाद “विनाशकारी भूकंप से मची तबाही और बचाव कार्य” पर वह अपने अधिकारियों की कार्यशाला आयोजित करेंगे। लोग सुरक्षा मानकों को नजर-अंदाज कर बहुमंजिली इमारतें बनाते जा रहे हैं? और सरकारें आँखें मूंद कर बैठी हैं। 

भूकंप आने के दो कारण

प्राकृतिक या मानवजनित। आज जो भी भूकंप आ रहे हैं मानवजनित ही हैं, जिनमे से एक प्रमुख कारण है – तेजी से वृक्षों की कटायी। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बाँध कर रखती हैं, जिससे भू-स्खलन नहीं होता और भूकंप का असर भी कम होता है। नीतीश कुमार वृक्षारोपण का अभियान सफलतापूर्वक चला कर देश के सामने एक मिसाल कायम कर चुके हैं। अगर वह चाहें तो सरकार यह नियम बना सकती है कि किसी भी भू-भाग पर किये जाने वाले किसी निर्माण के एक चौथाई हिस्से में वृक्षारोपण का होना अनिवार्य होगा। सरकार चाहे तो ये व्यवस्था भी सुनिश्चित कर सकती है कि सभी भवन अनिवार्य रूप से भूकंपरोधी होंगे, लेकिन केवल कानून बना देने भर से भी काम नहीं चलेगा। कानून के सही ढंग से पालन की व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी तभी नतीजे सामने आयेंगे। अब समय आ गया है कि आम जनता भूकंप के आतंक से सीख लेते हुए अब संभल जाये और सरकार आनेवाले खतरे को लेकर सचेत हो जाये, नहीं तो तबाही के समन्दर में लोक समा जायेगा और लोक चलाने वाले भी। बचेगी तो सिर्फ तबाही की निशानी। 

(देश मंथन, 28 अप्रैल 2015)

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