निभा सिन्हा :
आषाढ़ महीना का पूरा एक पक्ष निकल गया, मतलब कुल पंद्रह दिन, लेकिन बारिश की बूँदें गिन कर ही बरसी हैं इस बार भी। खबर मिली है गाँव से कि धान के बीज जल गये कई लोगों के इस बार भी। मुझे पता नहीं क्यूँ, नगीना बाबा बहुत याद आ रहे हैं।
नगीना बाबा लोगों के खेत बँटाई लेते और खूब मेहनत से काम करते। गाँव के लोगों को बहुत उम्मीद थी उनके परिवार से। उनके तीन बेटे थे तो गाँव वालों को अनजाने, अनचाहे में एक उम्मीद बन गयी कि जब तीनों बड़े होंगे तो उनके खेतों पर काम कर लेंगे और सालों से बंजर पड़े उनके खेतों को हरियाली नसीब हो जायेगी। लेकिन सालों से उन खेतों पर काम करके नगीना बाबा को आखिर पूरी जिंदगी क्या मिला? वही ढेरों छेद वाले बनियान, धोती और मजबूरी में अनाज ढोने के लिए एक गमछे के अलावा कहाँ नसीब हो पाया कुछ और? कभी गाँव की बारात में गये तो एक कुर्ता और प्लास्टिक वाला एक जूता निकलता जो बारात से आने के बाद दीवार पर लगे दो कीलों पर अगली बारात जाने तक के लिए टँग जाता। उनकी तीन बेटियों को भी तो अपने छोटे-छोटे सामानों के लिए तरसना पड़ता। आस-पड़ोस में शादी में लड़की के लिए आने वाले सामानों को देख कर वो भी इंतजार करने लगी थीं कि कब होगी उनकी भी शादी, जिसमें उन्हें भी नहाने का साबुन और सिर में लगाने के लिए तेल भी मिलेगा।
बँटाई और अपने एक बीघा से भी कम जमीन पर इतना ही उपजता कि कई शाम तो उनके घर चूल्हा भी नहीं जलता। क्योंकि हर बार फसल अच्छी ही होगी या होगी ही, इसकी कौन सी गारन्टी होती थी? कई बार तो पूरा मानसून सूखा ही निकल जाता और धान के बीज ही नहीं उगते कि फसल उपजे। गेहूँ का भी अमूमन यही हाल होता। कभी भगवान भरोसे फसल बच गयी तो चूल्हा रोज जल जाता। रहने को एक झोपड़ी। सब उसी में सोते गर्मी, जाड़ा, बरसात। बेटे वही सरकारी स्कूल में गये एकाध-दो साल। फिर उनकी ही मदद करने लगे काम में। जैसे ही 17 साल का हुआ सुधीर, भाग गया कलकत्ता कमाने क्योंकि अपनी बदहाली से परेशान हो गया था वो। उसके बाउजी नहीं जाने देते, इसलिए माँ के बक्से से ट्रेन भाड़ा निकाल कर भागा शहर मजदूरी करने। कुछ पैसे बचा कर गोलगप्पे भी बेचना शुरू किया सड़क के किनारे, एक ऑफिस के सामने। धीरे-धीरे आलू टिक्की, बर्गर, एग रोल और नूडल्स की भी माँग होने लगी। अपने दोनों भाइयों को भी ले गया वहीं। तीनों खूब मेहनत करने लगे । काम अच्छा निकल पड़ा शहर में। गाँव पर घर बना दिया दो रूम का छत वाला, तीन-चार सालों में ही।
अब नगीना बाबा किसी का खेत बँटाई नहीं लेते। अपने खेत पर मन लगाने के लिए थोड़ी-बहुत सब्जी लगा लेते हैं। फिक्र नहीं रहती कि इस बार खाने को कहाँ से आयेगा? हर महीने खाते में पैसे आ जाते हैं खर्चे के लिए। बेटे ने रोज पहनने का चप्पल भी खरीद दिया और घर में नहाने का साबुन और सिर में लगाने का तेल भी शहर से ले आता है। अब तो तबियत बिगड़ने पर डॉक्टर के पास भी चले जाते हैं। लेकिन ये तो नगीना बाबा जैसे खुशनसीब लोगों की कहानी है जिन्हें आत्महत्या नहीं करनी पड़ी। यदि बेटा होशियार नहीं रहता तो किसी न किसी दिन परिवार का कोई न कोई जान देता ही। और चारा ही क्या बचता?
दूसरे देश अपने किसानों को प्रोत्साहित करते हैं अच्छी पैदावार के लिए, क्योंकि उन्हें भारत में बाजार दिखता है लेकिन हमारे यहाँ तो किसान उपज कर भी ले तो भी उन्हें कीमत कौन दे रहा है? औने-पौने दामों में उनसे फसलें खरीद ली जाती हैं, और खरीदने वाले मनमर्जी कमाते हैं फिर।
सरकार सब्सिडी देने जैसी कुछ घोषणाएँ अपने बजट में करती रहती है, सब्सिडी के फण्ड भेजे भी जाते हैं गाँवों में किसानों के लिए, लेकिन उन तक पहुँचे तब न। अब इनकी सुध कौन ले? नगीना बाबा जैसे न जाने कितने मजबूर मजदूर किसान और अच्छे किसान (मजदूरों की अनुपस्थिति में खेती करना उनके लिए भी मुश्किल हो गया है ) हर साल अपनी बदहाली में शहर भागने को मजबूर हैं, अपने खेतों को बंजर छोड़ कर। मीडिया भी वहाँ पहुँचेगी तब जब बाबा जैसा कोई किसान दम तोड़ चुका होगा, खबर तो तब होगी जब उससे टीआरपी बढ़ने की गुंजाइश बनती हो। वैसे भी विकास हमारे देश में “समस्या” कहाँ, ये तो चुनावी मुद्दा है जिसका जिक्र हर पाँचवें वर्ष राजनीतिक पार्टियों के घोषणापत्र में होना काफी माना जाता है, तभी हम लगातार विकाशसील ही बने हुए हैं।
(देश मंथन 24 जुलाई 2016)