आओ, हिन्दी की भी सोच लें भाई

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संजय द्विवेदी, अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय : 

सितंबर का महीना आ रहा है। हिन्दी की धूम मचेगी। सब अचानक हिन्दी की सोचने लगेंगें। सरकारी विभागों में हिन्दी पखवाड़े और हिन्दी सप्ताह की चर्चा रहेगी। सब हिन्दीमय और हिन्दीपन से भरा हुआ। इतना हिन्दी प्रेम देख कर आँखें भर आएँगी। वाह हिन्दी और हम हिन्दी वाले। लेकिन सितंबर बीतेगा और फिर वही चाल जहाँ हिन्दी के बैनर हटेंगें और अंग्रेजी का फिर बोलबाला होगा। इस बीच भोपाल में विश्व हिन्दी सम्मेलन भी होना है। यहाँ भी दुनिया भर से हिन्दी प्रेमी जुटेगें और हिन्दी के उत्थान-विकास की बातें होंगी। ऐसे में यह जरूरी है कि हम हिन्दी की विकास बाधा पर भी बात करें। सोचें कि आखिर हिन्दी की विकास बाधाएँ क्या हैं?

एक तो यह बात मान लेनी चाहिए कि हिन्दी अपने स्वाभाविक तरीके से, सहजता के नाते जितनी बढ़नी थी, बढ़ चुकी है। अब उसे जो कुछ चाहिए वह इस तरह के कर्मकांडों से नहीं होगा। अब उसे जो कुछ दे सकती है सत्ता दे सकती है, राजनीतिक इच्छाशक्ति और संकल्प दे सकते हैं। पर क्या हमारी राजनीतिक, प्रशासनिक और न्यायिक संस्थाएँ हिन्दी को उसका हक देने के लिए तैयार हैं? यही सवाल भारत की सभी भाषाओं के सामने है। अगर सत्ता हक देना चाहती है, तो उसे किसने रोक रखा है? क्या वे अनंतकाल तक किसी शुभ मूहूर्त की प्रतीक्षा में ही रहेंगी या वे आगे बढ़कर हिन्दी को, भारतीय भाषाओं को सम्मान दिलाने का फैसला करेंगीं। हिन्दी और भारतीय भाषाओं में भारतीय नागरिकों को न्याय सुलभ होना चाहिए, आखिर इस फैसले पर किसे आपत्ति हो सकती है। पर है और बहुत गहरी आपत्ति है। न्याय भी हमें एक विदेशी भाषा में मिलता है,पर हम विवश हैं। इस विवशता में जो कुछ छिपा हुआ है उसे समझने की जरूरत है। इसी तरह हमारी उच्चशिक्षा का माध्यम भी कमोबेश एक विदेशी भाषा है। ज्यादातर भारत को इस तरह अज्ञानी रखने का षडयंत्र समझ से परे है। सत्ता आती है, जाती है किन्तु हिन्दी का सवाल वहीं का वहीं है। देश हिन्दी में बोलता है, सोचता है, साँसें लेता है, सपने देखता है, अपने आंदोलन-संघर्ष करता है। किन्तु अध्ययन-अध्यापन-रोजगार में सफलता की गारंटी तभी है जब आप अंग्रेजीदाँ भी हों। यहाँ किसी भाषा का विरोध या समर्थन का भाव नहीं है बल्कि अपनी भाषा के लिए आदर का भाव है। अगर भारतीय भाषाएँ रोजी-रोजगार और शिक्षा की भाषा नहीं बन सकीं तो इसका जिम्मेदार कौन है? राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी से लेकर आजादी के आंदोलन के सभी सिपाहियों ने अगर हिन्दी को आजादी के आंदोलन की भाषा माना और कहा कि यही भाषा देश को एक सूत्र में बाँध सकती है तो आजादी के बाद ऐसा क्या हुआ कि हिन्दी उपेक्षिता हो गयी? सही मायने में अतिलोकतंत्र और सुनियोजित साजिशों ने हिन्दी को उसके स्थान से गिराया और जनभावनाओं की उपेक्षा की।

जो देश अपनी भाषा में शिक्षा न हासिल कर सके, राज न चला सके, न्याय न कर सके, न न्याय पा सके उसके बारे में क्या कहा जा सकता है? हिन्दी की वैश्विक लोकप्रियता के बावजूद, उसके व्यापक आधार के बाद भी हिन्दी आज भी देश की राष्ट्रभाषा नहीं बन सकी तो इसके कारणों पर विचार करना होगा। देश की आजादी के बाद आखिर क्या हमारी सोच, एकता और सद्भावना के सूत्र बदल गये हैं? क्या आज हम ज्यादा विभाजित हैं और अपनी क्षेत्रीय अस्मिताओं को प्रति ज्यादा आस्थावान हो गये हैं? राष्ट्रीयता का भाव और उसकी भावना कम हो रही है? अगर ऐसा हुआ है तो क्या इन आजादी के सालों में हमने अपनी जड़ों से दूर जाने का काम किया है। जड़ों से दूर होता समाज क्या अपने राष्ट्रीय कर्तव्यों को पूर्ण कर पाएगा? भाषा के सवाल पर आज जिस तरह हम बंटे हैं और निरंतर बाँटे जा रहे हैं उससे लगता है कि अंग्रेजी लंबे समय तक राजरानी बनी बैठी रहेगी। हालात यह हैं कि आज अंग्रेजी समर्थकों की जमात आजादी की प्रप्ति के वर्ष से ज्यादा ताकतवर है। यह कितना बड़ा अन्याय है कि देश की सबसे लोकप्रिय भाषा (हिन्दी) के स्थान पर अंग्रेजी का राज प्रकारांतर से कायम है। राज्यों में भारतीय भाषा और देश में हिन्दी भाषा का प्रभाव होना था किन्तु आज देश से लेकर प्रदेश की राजधानियों तक कामकाज की भाषा अंग्रेजी बनी हुई है। एक विदेशी भाषा को अपनाते हुए हमें संकोच नहीं है, किंतु हम हिन्दी के खिलाफ एक खास मानसिकता से ग्रस्त हैं। हिन्दी की एक लंबी विरासत, उसकी बड़ी भौगोलिक उपस्थिति के बाद भी हमें हिन्दी के प्रति दुर्भाव को रोकना के सचेतन प्रयास करने होंगें।

राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को खुद को साबित करने के लिए किसी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है। किन्तु उसकी उपेक्षा के चलते वह इस रूप में खड़ी दिखती है। राजनीति के क्षेत्र में सभी राजनीतिक दल हिन्दी में वोट माँगते हैं किन्तु हिन्दी के सवाल पर एकजुटता नहीं दिखाते। राज्यों में प्रांतीय भाषाएँ और देश में हिन्दी इस नारे के साथ हमें आगे आना होगा। सच कहें तो कोई भी राजनीतिक दल भाषा के सवाल पर ईमानदार नहीं है और बाबुओं की तो कहिए मत- इसी अकेली अंग्रेजी के दम पर उनका राज चल रहा है इसलिए वे भला क्यों चाहेंगे कि अंग्रेजी इस देश से विदा हो।

हिन्दी के सम्मान की बहाली का काम अब राजनीति और संसद का ज्यादा है, जनता इसमें बहुत कुछ नहीं कर सकती। बड़ा खतरा यह है कि जिस तरह समाज अंग्रेजी शिक्षा के साथ अनूकूलित हो रहा है और सहजता से नयी पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की ओर जा रही है, के चलते देर-सबरे हिन्दी और भारतीय भाषाओं के सामने एक बड़ा बौद्धिक संकट खड़ा होगा। यह सवाल भी सामने खड़ा है कि क्या हिन्दी और भारतीय भाषाएँ सिर्फ वोट माँगने, मनोरंजन और विज्ञापन की भाषा बनकर रह जाएँगीं? हिन्दी और भारतीय भाषाओं के सामने यह चुनौती भी है कि वे खुद को उच्चशिक्षा, शोध और अनुसंधान की भाषा के रूप में खुद को स्थापित करें। राजनीतिक नेतृत्व पर दबाव बनाने के लिए जनसंगठन और सामाजिक संगठन आगे आएँ, हमारी भाषाएँ इस बाजार की आँधी में तभी बचेंगी। यह भी आवश्यक है कि सभी भारतीय भाषाएँ, अंग्रेजी और अंग्रजियत के इस मायाजाल के खिलाफ एकजुट हों।

(देश मंथन, 27 अगस्त 2015)

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