Saturday, March 28, 2026

देश मंथन डेस्क

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कहाँ छिप गए वे सेक्युलर, मानवतावादी!

पद्मपति शर्मा, वरिष्ठ खेल पत्रकार : 

क्यों नहीं पुरस्कार लौटाए जा रहे? चुप्पी क्यों ?

मालदा के बाद पूर्णिया! यह हो क्या रहा है? क्या सहिष्णुता सिर्फ उस बहुसंख्यक वर्ग के लिए ही है जिसको पंद्रह मिनट में काट देने की मंच से घोषणा करने वाले शख्स के आजादी के बाद दिये गये सबसे उकसावे वाले बयान के बावजूद देश की सेहत प्रभावित हुई? क्या कहीं हिंसा की खबरें आयी? क्या कहीं कानून-व्यवस्था को परेशानी हुई? नहीं न, क्योंकि सनातन धर्मी स्वभाव से सहनशील है। उसके शब्दकोश में नफरत या घृणा शब्द ही नहीं है। 

माल्दा, मुसलमान और कुछ सवाल!

कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार : 

माल्दा एक सवाल है मुसलमानों के लिए! बेहद गम्भीर और बड़ा सवाल। सवाल के भीतर कई और सवालों के पेंच हैं, उलझे-गुलझे-अनसुलझे। और माल्दा अकेला सवाल नहीं है। हाल-फिलहाल में कई ऐसी घटनाएँ हुईं, जो इसी सवाल या इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द हैं। इनमें बहुत-से सवाल बहुत पुराने हैं। कुछ नये भी हैं। कुछ जिहादी आतंकवाद और देश में चल रही सहिष्णुता-असहिष्णुता की बहस से भी उठे हैं।

अभेद्य रहा है वेलोर का किला

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार : 

महालक्ष्मी मंदिर के दर्शन के बाद हम वापसी को चल पड़े हैं। हमारी ट्रेन काटपाडी जंक्शन से है चेन्नई के लिए वैगेई एक्सप्रेस। श्रीपुरम से काटपाडी कोई 18 किलोमीटर है ऑटोवाले 180 रुपये माँग रहे हैं। हमें सलाह दी गयी थी, कि बस से न्यू बस स्टैंड पहुँचे फिर वहाँ से दूसरी बस लें। हमें मंदिर के मुख्य द्वार के बाहर से न्यू बस स्टैंड के लिए बस मिल गयी। बस पूरे वेलोर शहर के चक्कर काटती हुई न्यू बस स्टैंड पहुँचती है। रास्ते में आता है वेलोर का किला यानी वेलोर फोर्ट।

खुद को पहचानो

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :

मेरी पड़ोस की एक दीदी की शादी बहुत कम उम्र में हो गयी थी। 

काम के प्रति लगाव रखें

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक : 

एक भावी नेता ने मुझसे संपर्क किया और कहा कि फलाँ पार्टी के अध्यक्ष से तो आपके अच्छे संबंध हैं, आप उनसे मेरी सिफारिश कीजिए। उनसे कहिए कि अगर उन्हें टिकट मिला तो वो हर हाल में चुनाव जीत जाएँगे।

तमिलनाडु में हिंदी विरोध की दरकती दीवार

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार : 

चेन्नई और आसपास  के शहरों में घूमते हुए कहीं भी हिंदी विरोध का आभास नहीं हुआ। कई दिनों के तमिलनाडु प्रवास के दौरान जगह-जगह तमाम तमिल लोगों से संवाद करने का मौका मिला। ज्यादातर लोग हिंदी समझ लेते हैं। जवाब देने की भी कोशिश करते हैं। चेन्नई शहर के बस वाले आटो वाले हिंदी में उत्तर दे देते हैं।

रिश्तों को समय दीजिए

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :

मेरे दफ्तर के एक साथी को कुछ महीने पहले पिता बनने का सौभाग्य मिला है।

आतंकवाद से कैसे लड़ें

संजय द्विवेदी, अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय : 

आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई कड़े संकल्पों के कारण धीमी पड़ रही है। पंजाब के हाल के वाकये बता रहे हैं कि हम कितनी गफलत में जी रहे हैं। राजनीतिक संकल्पों और मैदानी लड़ाई में बहुत अंतर है, यह साफ दिख भी रहा है। पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों के रहते हम वैसे भी शांति की उम्मीदें नहीं पाल सकते, किंतु जब हमारे अपने ही संकल्प ढीले हों तो खतरा और बढ़ जाता है। आतंकवाद के खिलाफ लंबी यातना भोगने के बाद भी हमने सीखा बहुत कम है। किसी आतंकी को फाँसी देते वक्त भी हमारे देश में उसे फाँसी देने और न देने पर जैसा विमर्श चलता है उसकी मिसाल खोजने पर भी नहीं मिलेगी। आखिर हम आतंकवाद के खिलाफ जीरो टालरेंस का रवैया अपनाये बिना कैसे सुरक्षित रह सकते हैं।

मालदा पर मुखर हुए असगर वजाहत और कमर वहीद नकवी

देश मंथन डेस्क :

इस रविवार 3 जनवरी को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में विरोध रैली के नाम पर बड़ी संख्या में जमा हुए लोगों की हिंसक वारदातों पर ज्यादातर बुद्धिजीवियों ने चुप्पी साध रखी है, मगर प्रख्यात साहित्यकार असगर वजाहत और वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी ने मुखर तरीके से सख्त टिप्पणियाँ की हैं।

पठानकोट हमला : मोदी सरकार पर सवाल

राजेश रपरिया :

पठानकोट एयरबेस पर पाकिस्तानी आतंकवादियों के खौफनाक हमले से पहली बार मोदी सरकार के कामकाज, तत्परता, सतर्कता को लेकर सार्वजनिक रूप से सवाल उठ खड़े हुए हैं,  मोदी की टीम इंडिया के परखच्चे उड़ गये हैं। आतंकवादी कम से कम 48 घंटे पठानकोट में स्वच्छंद घूमते रहे और सुरक्षा तंत्र हाथ पर हाथ धरे अपनी माँद में बैठा प्रतीक्षा करता रहा।