अब आइने में अपनी शक्ल देखे इस्लाम… डरावनी हो चली है!

0
103

अभिरंजन कुमार, पत्रकार :

हमारे जम्मू-कश्मीर राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने उस सच्चाई को कबूल करने का साहस दिखाया है, जिसे तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले हमारे सुपर-सेक्युलर लोग समझते हुए भी स्वीकार करने को तैयार नहीं होते।

जब भी इस्लामिक आतंकवाद की चर्चा होती है, तो ये लोग फौरन यह कहना शुरू कर देते हैं कि आतंकवाद को धर्म से जोड़ कर देखना ठीक नहीं। ऐसे लोग इसके पीछे अमेरिका, रूस, यूरोपीय मुल्कों और तेल के खेल से लेकर एक हजार अन्य वजहें तो गिना देते हैं, लेकिन इस सच्चाई से हमेशा मुँह मोड़ लेते हैं कि कट्टरता भरी धार्मिक शिक्षा और विचारों का भी इसके पीछे बड़ा रोल है।

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में अभी जो आतंकवादी हमला हुआ है, उसमें, प्रत्यक्षदर्शियों और कई समाचार एजेंसियों के मुताबिक, आतंकवादियों ने अल्लाहू अकबर के नारे लगाए और बंधकों से कुरान की आयतें सुनाने के लिए कहा। इस तरह मुसलमानों और गैर-मुसलमानों की पहचान की गयी। मुसलमानों के साथ अच्छा व्यवहार किया गया और गैर-मुसलमानों को चुन-चुन कर मार डाला गया।

बांग्लादेश और पाकिस्तान में सिर्फ आतंकी हमलों के दौरान ही नहीं, आम दिनों में भी ग़ैर-मुसलमानों को चैन से जीने नहीं दिया जाता। वहाँ अल्पसंख्यकों, खासकर हिन्दुओं की क्या स्थिति है, यह बात किसी से छिपी नहीं। पिछले 69 साल में या तो उन्हें खत्म कर दिया गया, या उनका धर्मांतरण करा दिया गया। जो बचे-खुचे हैं, उनकी जिन्दगी जानवरों से भी बदतर है।

इन मुल्कों में अल्पसंख्यकों के ऐसे दयनीय हालात के लिए कट्टरपंथी इस्लामी शिक्षा और सोच को कसूरवार न ठहराएं, तो किसे ठहराएं? लगातार ढंकने-छिपाने से सच्चाई नहीं बदलती, इसलिए आतंकवाद और कट्टरता आज की तारीख में इस्लाम के माथे पर कलंक के बड़े धब्बे बन गये हैं और इस वजह से अन्य धर्मों के अनुयायियों में भी इसके प्रति नफरत पैदा हो रही है।

आखिर क्यों बराक ओबामा को यह कहना पड़ता है कि मुसलमान अपने बच्चों को आतंकवादी संगठनों के संक्रमण से बचाएं? आखिर क्यों डोनाल्ड ट्रम्प को अमेरिका में मुसलमानों का प्रवेश रोकने की बात करनी पड़ती है? आप ओबामा और ट्रम्प को मूढ़ समझें, मुस्लिम-विरोधी समझें, जो समझना हो समझें, लेकिन इसकी चिंता तो कीजिए कि दुनिया भर में मुसलमानों की छवि कितनी ख़राब हो गई है!

भारत में भी देखें, तो तथाकथित सेक्युलर-ब्रिगेड द्वारा आरएसएस और बीजेपी के खिलाफ तमाम नकारात्मक प्रचार-अभियानों के बावजूद इनकी ताकत बढ़ती ही क्यों चली गयी? स्वभावतः सहिष्णु और धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओं की जमात के एक बड़े हिस्से ने आखिर क्यों “सांप्रदायिक” आरएसएस और बीजेपी को सिर-आँखों पर बिठा लिया है?

क्या आरएसएस के इस सवाल का किसी के पास कोई जवाब है कि एक समय हिन्दू-बहुल रही कश्मीर घाटी में जब मुसलमानों की आबादी बढ़ी, तो वहाँ से हिन्दुओं को क्यों खदेड़ दिया गया? 1990 की शुरुआत में जो तीन लाख से ज्यादा पंडित वहाँ से विस्थापित हुए, आज 26 साल बाद भी किसी सरकार में इतनी हिम्मत क्यों नहीं हो पा रही कि उन्हें वापस वहाँ बसा दे?

इसी तरह, बांग्लादेशी घुसपैठियों के चलते जब असम की डेमोग्राफी में बदलाव आया और मुस्लिम आबादी बढ़ी, तो वहाँ के मूल निवासी क्यों परेशान हो उठे? क्यों वे अपने ऊपर इतना बड़ा खतरा महसूस करने लगे कि हालिया विधानसभा चुनावों में बांग्लादेशी घुसपैठ बड़ा मुद्दा बन गयी और लोगों ने “सेक्युलर-ब्रिगेड” को धूल चटाते हुए “सांप्रदायिक” ताकतों को चुन लिया?

इतना ही नहीं, जब बीजेपी के एक सांसद ने उत्तर प्रदेश के कैराना में मुसलमानों के खौफ से हिन्दुओं के पलायन की बात कही, तो लोगों ने सहसा इसपर यकीन क्यों कर लिया? आपने इस घटना के झूठ-सच की तरह-तरह से समीक्षा की होगी, लेकिन क्या यह सोचा कि लोगों ने इसपर इतनी आसानी से यकीन इसलिए कर लिया, क्योंकि वे सचमुच मानने लगे हैं कि जहाँ कहीं भी मुसलमानों की आबादी अधिक होगी, वहाँ दूसरे संप्रदाय के लोग चैन से रह ही नहीं सकते?

यह मुसलमानों की विश्वसनीयता की कमी है, जो आज की तारीख में सिर्फ भारत में ही नहीं, समूची दुनिया में आ गयी है। पेरिस हमले के बाद ओबामा ने कहा था कि मुस्लिम समाज के भीतर से आतंकवाद का जैसा विरोध होना चाहिए, वैसा नहीं हो रहा। ओबामा ने ऐसा इसलिए कहा था, क्योंकि आज दुनिया में बड़ी तादाद में लोग ऐसा ही महसूस कर रहे हैं।

यह अकारण नहीं है कि आज इराक, सीरिया, मिस्र, लीबिया, सूडान, यमन, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश समेत दुनिया के कई मुस्लिम-बहुल देश घनघोर अशांति में जी रहे हैं। एक-दूसरे को मारते-काटते हुए जी रहे हैं। कहने को मुल्क हैं, पर कबीलाई सोच से निकल ही नहीं पाये हैं। बात-बात पर कुरान की सीख का हवाला है, लेकिन वह कौन-सी कुरान है, जिसे तमाम तरह के धत्कर्मों में लिप्त लोग भी अपनी ढाल के तौर पर इस्तेमाल कर लेते हैं?

इस बात से मैं हमेशा हैरान होता हूँ कि हमारे देश के बेहतरीन दिमागों ने मिलकर जो संविधान बनाया, मात्र 66 साल में ही उसमें सौ से अधिक संशोधन करने पड़े, लेकिन वे कौन-से भले लोग हैं दुनिया के, जिनकी सोच डेढ़ हजार साल पुरानी एक किताब में ऐसी अटक गयी है कि इसे लेकर वे दुनिया के किसी-न-किसी कोने में रोज ही कोई-न-कोई बखेड़ा खड़ा कर देते हैं।

इतना ही नहीं, यह पुस्तक मानवतावादियों से लेकर आतंकवादियों तक को एक साथ प्रेरित कर रही है। बदलते समय और बदलती दुनिया के हिसाब से वहाँ बदलाव अथवा संशोधन की कोई गुंजाइश नहीं। कुरान की आयतें सुन-सुन कर बेगुनाहों को मारने वाले लोग कुरान को चाहे समझ रहे हों या न समझ रहे हों, लेकिन उसके प्रति ऐसी अंध-आस्था रख कर क्या वे हैवान नहीं बन चुके हैं?

खुद को श्रेष्ठतम मानना और अति-विस्तारवादी सोच इस्लाम की वह बड़ी बुराइयाँ हैं, जिनकी वजह से उसके धर्मावलंबी न सिर्फ स्वयँ बेचैन रहते हैं, बल्कि बाकी दुनिया को भी हिंसा और अशांति के दोजख में ढकेले रखना चाहते हैं। इतनी हिंसा, मार-काट और मजहबी कट्टरता के बीच आप दुनिया से इस्लाम को समझने की अपील करेंगे, तो कौन समझेगा? और बाकी दुनिया ही क्यों समझती रहे आपको? आप ही क्यों न समझें बाकी दुनिया को?

आज दुनिया के दबाव में इस्लामी जगत आतकंवाद के खिलाफ थोड़ा-बहुत बोल तो रहा है, पर करता हुआ कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा। जो बोला जा रहा है, उस पर भी संदेह होता है कि मन से बोला जा रहा है या बेमन से? पाकिस्तान के फौजी शासक रहे परवेज़ मुशर्रफ ने अमेरिका के हाथों मारे जा चुके कुख्यात आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को अपना “हीरो” करार दिया है। हाफिज सईद, मसूद अजहर, जकीउर्रहमान लखवी और दाऊद इब्राहिम तो पाकिस्तान में दामाद का दर्जा पाए हुए हैं।

इसी तरह, भारत में जब सैकड़ों बेगुनाहों की हत्या के दोषी आतंकवादी याकूब मेमन का जनाजा निकलता है, तो उसमें 20 हजार लोग शामिल हो जाते हैं। जब संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु के महिमा-मंडन में नारे लगते हैं- “कितने अफजल मारोगे, घर-घर से अफजल निकलेगा”, तो ऐसे नारे लगाने वालों के विरोध में जितने लोग खड़े नहीं होते, घुमा-फिराकर उससे ज्यादा उनके समर्थन में खड़े हो जाते हैं। क्या यही आतंकवाद की मुखालफत है?

जाहिर है, इस्लाम के लिए यह बदनामी भरा वक्त है। उसके नाम पर दुनिया भर में सैकड़ों आतंकवादी संगठन हर रोज अनगिनत बेगुनाहों की हत्याएं कर रहे हैं। इस बुरे वक्त में अगर इस्लाम के भीतर से महबूबा मुफ्ती और शेख हसीना जैसे विचार बड़ी तादाद में मजबूती से बाहर नहीं आएंगे और इस्लाम अपने भीतर के गुनहगारों से लड़ता हुआ दिखाई नहीं देगा, तो न सिर्फ उसकी छवि और बिगड़ती चली जाएगी, बल्कि उसपर हमले भी बढ़ते चले जाएंगे।

सत्य नहीं होता सुपाच्य, किंतु यही वाच्य। इक्कीसवीं सदी की दुनिया दकियानूसी और कट्टरपंथी विचारों के लिए नहीं है, इसलिए अब वह वक्त आ गया है, जब इस्लाम अपनी शक्ल आइने में देखे।

डिस्क्लेमर : यह लेख इस्लाम के खिलाफ नहीं, बल्कि इस्लाम के हक में है। जिनमें इसे समझने की शक्ति है, उनका शुक्रिया। जो इसे नहीं समझ सकते, उनकी समझदारी के लिए हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं। जिन्होंने हिंसा और बदनामियों के ही रास्ते मजहबी विचारों के विस्तार का मंसूबा बांध रखा है, उन मूढ़ों को हमें कुछ नहीं समझाना।

(देश मंथन 05 जुलाई 2016)

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें