संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
कहानी क्या होती है?
घटनाओं का ब्योरा? नहीं। घटनाओं का ब्योरा तो रिपोर्टिंग हो गयी। रिपोर्टिंग मतलब, जो देखा उसे बयाँ कर दिया।
पर कहानियाँ तो कभी कल्पना के पंख पर उड़ने वाली घटनाएँ होती हैं, कभी सच के पहिए पर दौड़ने वाली हकीकत।
मुझे तो माँ ने ढेरों कहानियाँ सुनायी हैं। मैंने हर कहानी को जिन्दगी के एक अध्याय की तरह आत्मसात किया है। माँ जब इस दुनिया से चली गयीं तो मैंने किताबों में कहानियाँ ढूंढनी शुरू कर दीं।
फिर इंटरनेट का जमाना आया तो यहाँ भी कहानियों ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। मैं आज भी अच्छी कहानियाँ पढ़ कर अकेले में मुस्कुरा उठता हूँ।
पिछले दिनों किसी ने ‘संजय सिन्हा फेसबुक परिवार’ के ग्रुप में ऐसी ही एक कहानी को साझा किया। मैंने अपने दफ्तर में कई लोगों को ये कहानी सुनायी। सबको ये कहानी बहुत अच्छी लगी। क्योंकि वाकई कहानी बहुत अच्छी है, इसलिए मेरा मन कर रहा है कि मैं आज इसे आपसे साझा करूं। हालाँकि मुझे उम्मीद है कि आपने भी ये कहानी पढ़ी होगी।
आपने पहले पढ़ी या सुनी है तो कोई बात नहीं। लेकिन एक बार आप इसे आत्मसात करके देखिए, क्या पता जिन्दगी बदल ही जाए।
तो शुरू करता हूँ कहानी।
एक बार एक साधु अपने शिष्य के साथ जंगल में चला जा रहे थे। दूर-दूर तक सुनसान। सारी भूमि बंजर। कहीं हरियाली का नामोनिशान नहीं। चलते-चलते साधु की नजर एक झोपड़ी पर पड़ी। साधु ने शिष्य से कहा कि यहाँ जरूर कोई रहता है। चलो, आज हम यही विश्राम करेंगे।
शिष्य ने झोपड़ी के दरवाजे पर दस्तक दी तो एक आदमी बाहर निकला।
शिष्य ने बताया कि हम दूर से पैदल चलते हुए आये हैं। हम चाहते हैं कि आज की रात यहीं विश्राम करें।
आदमी बहुत खुश हुआ। उसने साधु और शिष्य का बहुत सत्कार किया। दोनों को रात में खुद भोजन बना कर खिलाया। भोजन के दौरान साधु ने उस आदमी से पूछा कि तुम क्या करते हो?
आदमी ने जवाब दिया, “जी मेरे पास एक भैंस है। मैं उस भैंस के दूध को पास के गाँव में बेच देता हूँ। उससे जो मिलता है, किसी तरह मुझ अकेले का घर चल जाता है।
“अगर मुश्किल से घर चलता है तो तुम्हारे पास इतनी खाली जमीन है, तुम खेती भी कर लिया करो।”
“महाराज, ये भूमि बंजर है। यहाँ कुछ नहीं हो सकता।”
साधु ने कोई जवाब नहीं दिया। भोजन कर के वो सोने चला गये।
***
आधी रात को अचानक साधु जागे। उन्होंने शिष्य को आवाज दी कि तुम उठो। उस आदमी ने जो भैंस बाहर बाँध रखी है, उसे खोलो और अपने साथ ले चलो। उसे हम ऊपर की पहाड़ी से नीचे गिरा देंगे।
शिष्य बहुत हैरान हुआ। साधु को अचानक ये क्या हुआ? कैसी बातें कर रहे हैं? जिस आदमी ने उन्हें अपने घर में पनाह दी है, उसी की भैंस को वो मार देना चाहते हैं? पर गुरु का आदेश वो टाल नहीं सकता था। वो चुपचाप उठा। जैसा गुरु ने कहा उसने वैसा ही किया।
आधी रात को आदमी सोता रहा, साधु और शिष्य भैंस लेकर निकल पड़े। कुछ दूर चलते हुए पहाड़ी के ऊपर पहुँचे और वहाँ से उन्होंने भैस को धक्का दे दिया और निकल पड़े आगे।
***
कई साल बीत गये। अपराध बोध की वजह से शिष्य को नींद नहीं आती थी। उसे लगता था कि गुरु जी ने उस आदमी के साथ अन्याय किया है। पर वो उनसे कभी कुछ कह नहीं पाया।
एक दिन शिष्य से रहा नहीं गया। उसे लगा कि दुबारा उस आदमी से मिलना चाहिए, उससे उस सच को बयाँ करना चाहिए। अपराध बोध में डूबा वो शिष्य बिना साधु को बताए दुबारा उस आदमी के गाँव पहुँचा।
वहाँ पहुँच कर वो हैरान रह गया। जो भूमि बिल्कुल बंजर पड़ी थी, वहाँ खूब हरियाली थी। कई पेड़ लगे थे। फलों और सब्जियों का पूरा बगीचा लगा था। शिष्य हैरान था। ये कैसे हुआ?
वो घर के भीतर घुसने ही वाला था कि उसे ट्रैक्टर से उतरता हुआ वही आदमी दिखा, जिसकी भैंस साधु ने पहाड़ की चोटी से धक्का देकर नीचे गिरा दी थी।
आदमी ने भी शिष्य को पहचान लिया।
“और कैसे हो भाई? साधु महाराज कहाँ हैं? उस रात तो आपलोग मुझसे बिना मिले, बिना बताए चुपचाप ही निकल गए। मैंने तो सुबह उठ कर आप लोगों को बहुत ढूँढा पर कुछ पता ही नहीं चला।
“हां, तुम सो रहे थे। हमें जल्दी थी, इसलिए हम बिना बताए निकल गये। खैर, ये तो बताओ कि यहाँ की भूमि तो बंजर थी। अब इतनी हरियाली, बाग-बगीचा कैसे?”
“कुछ न पूछो मेरे भाई। उस रात तुम लोग आये तो सब ठीक था। पर जब तुम चले गए तो पता नहीं कैसे मेरी भैंस भी रस्सी तुड़ा कर यहाँ से निकल भागी। भागते हुए वो उस पहाड़ी तक पहुँची और वहाँ से गिर कर मर गयी। अब भैंस मर गई तो मैं बहुत परेशान हुआ। मेरे पास अब कुछ भी नहीं था कि मैं जी पाऊँ, खा पाऊँ। मेरे पास तो यही बंजर भूमि थी। मैंने थोड़ी सब्जियाँ लगायीं, काफी मेहनत की। धीरे-धीरे सब्जियाँ लग गयीं। फिर मैंने उन्हें बाजार में बेचा। कुछ पैसे आये तो फिर मैंने फूलों की खेती की। फल के वृक्ष लगाये। अब तो यहाँ की भूमि बहुत उपजाऊ हो गयी है। अब मैं यहाँ का सबसे बड़ा किसान बन गया हूँ। तुम देखो मेरा ट्रैक्टर। अब मेरा परिवार भी मेरे साथ ही रहने लगा है। भैंस मर तो गयी, पर मरते-मरते मुझे जीने का राह दिखा गयी।
भैंस के मर जाने के बाद मैंने सीखा की जब कुछ नहीं हो, तब भी जिन्दगी चलती है। जब कुछ नहीं होता है, तब भी रोशनी की किरण होती है। बस तबियत से एक कोशिश करनी पड़ती है। मेरे विकल्प खत्म हो गये थे, इसलिए संकल्प में शक्ति आ गयी। मैंने महसूस किया कि भूमि बंजर नहीं होती, मन बंजर होता है।
बस फिर क्या था, आज सच तुम्हारे सामने है।”
शिष्य ने उस आदमी से कुछ नहीं कहा। बस चल पड़ा साधु के पास।
आदमी ने जाते हुए शिष्य से कहा, “साधु बाबा को मेरा प्रणाम कहना।”
***
शिष्य साधु के पास पहुँचा। उसने कहा कुछ नहीं। बस साधु के पाँव पकड़ कर रोता जा रहा था।
***
जब जिन्दगी की भैंस का साथ छूट जाता है, तभी बंजर मन में हरियाली आती है। जो लोग भैंस को पकड़े रहते हैं, उनके आसपास की भूमि बंजर ही रह जाती है।
(देश मंथन 07 फरवरी 2016)