सुशांत झा, पत्रकार :
पता नहीं कितने साल हुए दुर्गा पूजा में गाँव गये हुए। हमारे यहाँ दशहरा नहीं बोलते हैं, दुर्गा पूजा या नवरात्रा बोलते थे। हद से हद दशमी। कलश स्थापन से ही पूजा शुरू। बेल-नोती और बेल तोड़ी..फिर बलि-प्रदान, मेला।
एक जमाने में रामलीला और नाटक होते थे गाँव में। बाद में बंद हो गये। क्योंकि गाँव में नौजवान ही नहीं रहे। मेरे गाँव में नाटक और क्रिकेट टीम एक ही साथ बंद हुए। कोई 93-94 के आसपास की बात होगी। नाटक का स्थान वीसीआर पर दिखने वाली फिल्मों ने ले लिया। संजय दत्त और जैकी श्रॉफ नए राम-लखन बन गये।
पैसे वाले लोगों के बच्चे पढ़ने दिल्ली चले गये और कम पैसे वालों के दरभंगा। बिल्कुल गरीबों के बच्चे दिल्ली, जयपुर, सूरत और पंजाब चले गये मजूरी करने। ऐसे मे क्रिकेट और नाटक के लिए दर्जन भर नौजवान नहीं थे।
मंगलवार को शाम में कीर्तन होता था, वो भी बंद हो गया। मजे की बात यह कि मंगल की शाम कीर्तन के लिए जिसने भी आविष्कार किया वो कोई कमाल का लाल-बुझक्कड़ था। नया-नया टीवी का जमाना था, सो रविवार से लेकर शनिवार तक कुछ न कुछ आता था। मंगलवार लगभग वीरान था। सो उस दिन कीर्तन रख दिया गया!
गाँव के मेले में उस जमाने में दो-तीन मिठाई की दुकान होती, और दर्जनों झिल्ली-मुरही की दुकानें। खिलौने, भारत का नक्शा, बलून, महिला-प्रसाधन की दुकानें, पान की दुकानें।
दसवीं में पढ़नेवाले गाँव के लड़के अपनी बैचमैट छात्राओं के पीछे-पीछे मेले में मंडराते। कई बार राइवल ग्रुप में झगड़ा हो जाता। कई बार लड़की को पता तक नहीं चलता कि किसकी वजह से दो लड़के लड़ पड़े!
आखिरी दिन यानी दशमी (मैथिली में दशमी) के दिन को ‘जतरा’ (जात्रा या यात्रा) कहा जाता। यानी देवी के विदाई का दिन। हम लोग नीलकंठ पक्षी खोजते। नीलकंठ को महादेव का अवतार मानते हैं। हम अपनी शिखाओं में ‘जयंती’ बांधते (अब तो शिखा ही गायब है!), बड़ों का पैर छूते और चल पड़ते विसर्जन देखने। विसर्जन के समय जोर से ‘दुर्गा महारानी की जय’ कहा जाता।
उस जमाने में ये लगभग नियम था कि जो कोई बाहर नौकरी करता वो जरूर दूर्गा पूजा में गाँव आता। उस बहाने लोगों का गेट-टुगेदर हो जाता। कोई औरंगाबाद से आता तो कोई पटियाला से। दिल्ली और कलकत्ता तो लगता था अगला बस स्टॉप बन गया है। धीरे-धीरे दुर्गा पूजा में गाँव आने की वो अनिवार्य सी परंपरा कमजोर होती गयी। लोगबाग अलग-अलग समयों में गाँव जाने लगे। बाद में तो सिर्फ किसी के श्राद्ध या किसी की बेटी की शादी में।
मेरे पड़ोस के गाँव नवनगर में अभी भी नाटक होता है, लेकिन आउट-सोर्श हो गया है। एकाध दिन गाँव वाले भी करते हैं-बाकी बाहर की टीम आती है। भोजपुरी गीतों पर डांस होता है-मिथिला की हृदयस्थली में भोजपुरी गीत बजते हैं-अक्सर बढ़िया वाले नहीं…यूट्यूब टाइप। सुना है कि अब पूजा कमेटी के लिए पुलिस की परमिशन चाहिए होती है। शायद ऐसा 15 साल पहले नहीं था। अब वाकई जमाना बदल गया है।
आज सुबह पिताजी से बात हुई, तो बोल रहे थे कि मेला में दुकानों की संख्या कई गुणा ज्यादा है और भीड़ भी। लेकिन मेला में पुलिस घूमने लगी है। मन खट्टा हो गया। लेकिन एक बार लगा कि आज के दिन मुझे ऑफिस में और दिल्ली में नहीं होना चाहिए था। काश..ऐसा हो पाता….!
(देश मंथन, 23 अक्तूबर 2015)