Saturday, April 20, 2024
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क्या विजय रुपानी को मिलेगा जन्मदिन का तोहफा?

राणा यशवंत, प्रबंध संपादक, इंडिया न्यूज :

आनंदी बेन ने पद छोड़ने की इच्छा फेसबुक पर ज़ाहिर की, यह अपनी तरह की पहली घटना है। गुजरात में भाजपा कई सवालों में है और अगर अगले साल वह गुजरात हारती है तो प्रधानमंत्री मोदी के लिए उनके पाँच साल के कार्यकाल की (मैं अगले ढाई साल भी जोड़ ले रहा हूँ) यह सबसे बड़ी हार होगी। और, 2019 की मोदी की लड़ाई को बहुत कमजोर भी करेगी।

मान-सम्मान की जंग से चुनावी जीत की ललक

राजेश रपरिया :

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के चहेते उत्तर प्रदेश भाजपा के हाल तक रहे उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह की बसपा सुप्रीमो मायावती पर की गयी एक अभद्र टिप्पणी से विधानसभा चुनावों के तकरीबन 9 महीने पहले अनायास या सायास भूचाल आ गया है।

अदालत में तार्किक अंजाम तक पहुँचे डिग्री विवाद

राजीव रंजन झा : 

चाहे प्रधानमंत्री बनना हो या दिल्ली के आधे-अधूरे राज्य की विधानसभा का सदस्य बनना, उसके लिए कोई डिग्री आवश्यक नहीं है। लेकिन यदि कोई चुनावी प्रक्रिया में झूठा शपथपत्र दाखिल करे तो यह एक गंभीर मसला हो जाता है।

अमित शाहः कांटों का ताज

संजय द्विवेदी, अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय  :

भारतीय जनता पार्टी ने अंततः अमित शाह को दोबारा अपना अध्यक्ष बना कर यह संदेश दे दिया है कि पार्टी में ‘मोदी समय’ अभी जारी रहेगा। कई चुनावों में पराजय और नाराज बुजुर्गों की परवाह न करते हुए बीजेपी ने साफ कर दिया है कि अमित शाह, उसके ‘शाह’ बने रहेंगे। दिल्ली और बिहार की पराजय ने जहाँ अमित शाह के विरोधियों को ताकत दी थी, तथा उन्हें यह मौका दिया था कि वे शाह की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर सकें। किंतु विरोधियों को निराशा ही हाथ लगी और शाह के लिए एक मौका फिर है कि वे अपनी आलोचनाओं को बेमतलब साबित कर सकें।

बिहार में किसकी हार?

कमर वहीद नकवी , वरिष्ठ पत्रकार :

बिहार विधानसभा चुनाव। बिहार में किसकी हार? सवाल अटपटा लगा न! लोग पूछते हैं कि चुनाव जीत कौन रहा है! लेकिन यहाँ सवाल उलटा है कि चुनाव हार कौन रहा है? बिहार के धुँआधार का अड़बड़ पेंच यही है! चुनाव है तो कोई जीतेगा, कोई हारेगा। लेकिन बिहार में इस बार जीत से कहीं बड़ा दाँव हार पर लगा है! जो हारेगा, उसका क्या होगा?

25 साल में तो पाँच बार चुनाव होंगे हुजूर

राजीव रंजन झा :

देश के प्रमुख सत्ताधारी दल का अध्यक्ष होने के नाते अमित शाह को यह भी भान होगा कि केवल अपने कार्यकर्ताओं से 25 साल माँग लेना काफी नहीं है। उन्हें ये 25 साल देश की जनता से भी माँगने होंगे और जनता ने उन्हें दिया भी तो एकमुश्त नहीं देगी, किस्तों में देगी। 

अबकी बार, क्या क्षेत्रीय दल होंगे साफ?

क़मर वहीद नक़वी, वरिष्ठ पत्रकार :

राजनीति से इतिहास बनता है! लेकिन जरूरी नहीं कि इतिहास से राजनीति बने! हालाँकि इतिहास अक्सर अपने आपको राजनीति में दोहराता है या दोहराये जाने की संभावनाएँ प्रस्तुत करता रहता है!

उपचुनावों के नतीजों से गुमान टूटेगा भाजपा का

राजीव रंजन झा :

शायद ही किसी ने सोचा होगा कि लोकसभा चुनावों में तूफानी कामयाबी के बाद इन उपचुनावों में भाजपा इतना कमजोर प्रदर्शन करेगी।

यही सब होगा तो साख कहाँ से आयेगी?

क़मर वहीद नक़वी, वरिष्ठ पत्रकार :

बच्चे थे, तब से सुन रहे हैं! शायद तब से अब तक हजारों बार सुन-पढ़ चुके हैं! न्याय न सिर्फ होना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए! तो बाकी बातें छोड़ दीजिए, बस जी कर रहा है कि यही एक सवाल माननीय पी. सदाशिवम जी से पूछूँ।

संघ का शाह के जरिये राजनीतिक शह-मात का खेल

पुण्य प्रसून बाजपेयी, कार्यकारी संपादक, आजतक : 

जिस खामोशी से अमित शाह बीजेपी हेडक्वार्टर में बतौर अध्यक्ष होकर घुसे हैं उसने पोटली और ब्रीफकेस के आसरे राजनीति करने वालो की नींद उड़ा दी है। अध्यक्ष बनने के बाद भी खामोशी और खामोशी के साथ राज्यवार बीजेपी अध्यक्षों को बदलने की कवायद अमित शाह का पहला सियासी मंत्र है।

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