देश मंथन डेस्क
मन चंगा तो कठौती में गंगा

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
एक बार एक व्यक्ति की शिकायत हुई कि वो बहुत गाली देता है।
शिकायत की सुनवाई के लिए उस व्यक्ति को बुलाया गया। उसे बताया गया कि तुम अपनी बातचीत में बहुत गाली देते हो। व्यक्ति भड़क गया। उसने बिगड़ते हुए कहा, "कौन साला, कुत्ते का बच्चा कहता है कि मैं बहुत गालियाँ देता हूँ। तुम एक भी ऐसा आदमी लेकर आओ, जो ये कह सके कि मैंने कभी किसी को गाली दी हो। ये मेरे खिलाफ सरासर झूठा आरोप है।"
प्रेरणा

प्रेमचंद :
मेरी कक्षा में सूर्यप्रकाश से ज्यादा ऊधामी कोई लड़का न था, बल्कि यों कहो कि अध्यापन-काल के दस वर्षों में मुझे ऐसी विषम प्रकृति के शिष्य से साबका न पड़ा था। कपट-क्रीड़ा में उसकी जान बसती थी। अध्यापकों को बनाने और चिढ़ाने, उद्योगी बालकों को छेड़ने और रुलाने में ही उसे आनन्द आता था। ऐसे-ऐसे षडयंत्र रचता, ऐसे-ऐसे फंदे डालता, ऐसे-ऐसे बंधन बाँधता कि देखकर आश्चर्य होता था। गिरोहबंदी में अभ्यस्त था। खुदाई फौजदारों की एक फौज बना ली थी और उसके आतंक से शाला पर शासन करता था।
हैदराबाद का लकड़ी का पुल

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
लकड़ी का पुल हैदराबाद। नाम सुन कर कुछ रोमांच होता है। पर यहाँ कहीं लकड़ी का पुल दिखायी नहीं देता। रहा जरूर होगा। तभी तो नाम है। अब इस नाम का एक लोकल रेलवे स्टेशन भी है। लकड़ी का पुल ( स्टेशन कोड -LKPL)। हैदराबाद से सिकंदराबाद रेल मार्ग पर 1.30 किलोमीटर की दूरी पर लकड़ी का पुल रेलवे स्टेशन आता है। तो इसके अंग्रेजी अनुवाद पर वुडब्रिज ग्रैंड नामक होटल भी है। पर जनाब लकड़ी का पुल हैदराबाद का दिल है। इसके आसपास हैदराबाद की प्रमुख बाजार है। हैदराबाद का मुख्य स्टेशन हैदराबाद जंक्शन यानी नामपल्ली भी इसके पास ही है।
बेटियों को हक है खुश होने का

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
मैंने पहली बार जब शहनाई की आवाज सुनी थी, तब मैं मेरी उम्र आठ साल रही होगी। दीदी का शादी तय हो गयी थी और घर में उत्सव का माहौल था।
जिस दिन दीदी की शादी होने वाली थी, दो शहनाई वाले छत पर बैठ कर पूँ-पूँ बजा रहे थे। मुझे राग का ज्ञान नहीं था, लेकिन उनके मुँह से लगी शहनाई से जो आवाज निकल रही थी, वो दिल के किसी कोने में मोम बन कर पिघलती सी लग रही थी।
सांप्रदायिकता से कौन लड़ना चाहता है?

संजय द्विवेदी, अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय :
देश भर के तमाम हिस्सों से सांप्रदायिक उफान, गुस्सा और हिंसक घटनाएँ सुनने में आ रही हैं। वह भी उस समय जब हम अपनी सुरक्षा चुनौतियों से गंभीर रूप से जूझ रहे हैं। एक ओर पठानकोट के एयरबेस पर हुए हमले के चलते अभी देश विश्वमंच पर पाकिस्तान को घेरने की कोशिशों में हैं, और उसे अवसर देने की रणनीति पर काम कर रहा है। दूसरी ओर आईएस की वैश्विक चुनौती और उसकी इंटरनेट के माध्यम से विभिन्न देशों की युवा शक्ति को फाँसने और अपने साथ लेने की कवायद, जिसकी चिंता हमें भी है। मालदा से लेकर पूर्णिया तक यह गुस्सा दिखता है, और चिंता में डालता है। पश्चिम बंगाल और असम के चुनावों के चलते इस गुस्से के गहराने की उम्मीदें बहुत ज्यादा हैं।
जिन्दगी न मिलेगी दोबारा

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
आसमान मेरे लिए हमेशा कहानियों का सबसे बड़ा संसार रहा है।
मैं जब-जब आसमान में उड़ता हूँ, मेरी आँखों के आगे कहानियाँ तैरने लगती हैं। अब कायदे से मुझे अपने अमेरिका प्रवास की कहानी ही आज लिखनी थी, लेकिन कल सुबह मैं दिल्ली से पटना के लिए उड़ गया। अब अगले दो दिनों तक मुझे पटना में ही रहना है। इसके बाद दिल्ली वापस आऊँगा और उड़ जाऊँगा सिंगापुर की ओर।
द वुड्स आर लवली डार्क एंड डिप…

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
वुड्स आर लवली डार्क एंड डीप..बट आई हैव प्रामिस टू कीप...आई हैव माइल्स टू गो बिफोर आई स्लीप...राबर्ट फ्रेस्ट की ये पंक्तिया याद आती हैं जब हम हैदराबाद से श्रीशैलम की ओर जाते समय घने जंगलों से होकर गुजरते हैं। घने जंगलों का ये इलाका नागार्जुन श्रीशैलम टाइगर रिजर्व का है। ये देश का सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व है क्षेत्रफल के लिहाज है। इस अभ्यारण्य का विस्तार पाँच जिलों में है।
बच्चों को मिले विश्वास और भरोसा

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
मैंने बताया था न कि घर की सफाई में मेरे हाथ बहुत सी पुरानी यादें लगीं।
यादों के उसी पिटारे से मैं आपके लिए कल अपनी काठमांडू यात्रा की कहानी ले कर आया था। मैंने आपको कल ही बताया था कि यादों के उन्हीं पुलिंदे में मेरे अमेरिका प्रवास के दौरान लिखे कुछ लेख हाथ लगे। इनमें से कुछ तो मैंने अमेरिका से दिल्ली फैक्स के जरिए Sanjaya Kumar Singh को भेजे थे और वो यहाँ जनसत्ता में छपे भी थे। बात अमेरिका के न्यूयार्क शहर में ट्वीन टावर पर हुए हमले के दिन की है।
कचौड़ी का लोकार्पण

आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
दिल्ली का पुस्तक मेला निपट गया कल रविवार 17 जनवरी को। हिंदी के स्टालों पर यह शुबहा रहा कि लोकार्पण-कर्ता ज्यादा हैं हिंदी में या पाठक ज्यादा।
किताबों का लोकार्पण पहले होता था, अब लोकार्पण मचता है, खास तौर पर पुस्तक मेले में।
पाकिस्तान : यह माजरा क्या है?

कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार :
क्या पाकिस्तान बदल रहा है? पठानकोट के बाद पाकिस्तान की पहेली में यह नया सवाल जुड़ा है। लोग थोड़ा चकित हैं। कुछ-कुछ अजीब-सा लगता है। आशंकाएँ भी हैं, और कुछ-कुछ आशाएँ भी! यह हो क्या रहा है पाकिस्तान में? मसूद अजहर को पकड़ लिया, जैश पर धावा बोल दिया, सेना और सरकार एक स्वर में बोलते दिख रहे हैं, पाकिस्तान अपनी जाँच टीम भारत भेजना चाहता है, और चाहता है कि रिश्ते (Indo-Pak Relations) सुधारने की बातचीत जारी रहे। ऐसा माहौल तो इससे पहले कभी पाकिस्तान में दिखा नहीं! तो क्या वाकई पाकिस्तान में सोच बदल रही है? क्या अब तक वह आतंकवादियों के जरिये भारत से जो जंग लड़ रहा था, उसे उसने बेनतीजा मान कर बन्द करने का फैसला कर लिया है? क्या वहाँ की सेना भी उस जंग से थक चुकी है? क्या पाकिस्तान इस बार वाकई आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करेगा या फिर वह बस दिखावा कर रहा है? क्या उस पर भरोसा करना चाहिए? टेढ़े सवाल हैं।



संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
प्रेमचंद :
विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
संजय द्विवेदी, अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय :
आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार : 




