Sunday, March 15, 2026
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दो कब्रें

प्रेमचंद :

अब न वह यौवन है, न वह नशा, न वह उन्माद। वह महफिल उठ गई, वह दीपक बुझ गया, जिससे महफिल की रौनक थी। वह प्रेममूर्ति कब्र की गोद में सो रही है। हाँ, उसके प्रेम की छाप अब भी ह्रदय पर है और उसकी अमर स्मृति आँखों के सामने। वीरांगनाओं में ऐसी वफा, ऐसा प्रेम, ऐसा व्रत दुर्लभ है और रईसों में ऐसा विवाह, ऐसा समर्पण, ऐसी भक्ति और भी दुर्लभ। कुँवर रनवीरसिंह रोज बिला नागा संध्या समय जुहरा की कब्र के दर्शन करने जाते, उसे फूलों से सजाते, आँसुओं से सींचते।

हमार बैलगाड़ी सबसे अगाड़ी… जोगिंदर सिंह अलबेला की याद

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

हमार बैलगाड़ी सबसे अगाड़ी...सड़किया पे गाड़ी हमार बैलगाड़ी
चलल जाला चलल जाला चलल जाला.. सड़किया पे गाड़ी हमार बैलगाड़ी
हट हट हट हट....
आकाशवाणी पटना से फरमाईशी लोकगीतों की सूची में अस्सी के दशक में यह बड़ा ही लोकप्रिय माँग वाला गीत होता था। जब रेडियो पर ये गाना बजता था तो ऐसी जीवंत अनुभूति होती थी मानो हमारी आँखों के सामने झूमती हुई बैलगाड़ी जा रही हो। गीत के पूरे बोल अब मुझे याद नहीं हैं पर इसमें एक झूमती हुई बैलगाड़ी के सड़क पर सफर का मस्ती भरा चित्रण था। तब हम इसके गायक का नाम पर ध्यान नहीं देते थे पर गीत को बडे मनोयोग से सुना करते थे।

तगादा

प्रेमचंद : 

सेठ चेतराम ने स्नान किया, शिवजी को जल चढ़ाया, दो दाने मिर्च चबाये, दो लोटे पानी पिया और सोटा लेकर तगादे पर चले। सेठजी की उम्र कोई पचास की थी। सिर के बाल झड़ गये थे और खोपड़ी ऐसी साफ-सुथरी निकल आई थी, जैसे ऊसर खेत। आपकी आँखें थीं तो छोटी लेकिन बिलकुल गोल।

विशाखापत्तनम – ज्वेल ऑफ द इस्ट कोस्ट

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

आंध्र प्रदेश के शहर विशाखापत्तनम को ज्वेल ऑफ द इस्ट कोस्ट कहा जाता है। तेलंगाना के अलग होने के बाद यह आंध्र का सबसे बड़ा शहर है। इसकी आबादी 2011 में 17 लाख से ज्यादा थी, जबकि तीसरे बड़े शहर विजयवाड़ा की आबादी 10 लाख से ज्यादा थी।

अपने पँखों पर भरोसा रखिए

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

एक नौजवान हाथ में शीशे की गिलास लेकर लोगों से पूछ रहा था कि क्या मुझे कोई बता सकता है कि इसे किसने बनाया? लोग उसके सवाल को नहीं समझ पा रहे थे कि वो ऐसा क्यों पूछ रहा है। पर किसी ने कहा कि इसे आदमी ने बनाया है। नौजवान हँसा और फिर उसने पूछा कि आपने जो कपड़े पहन रखे हैं, क्या आप जानते हैं उन्हें किसने बनाया है? 

विजयवाड़ा से विशाखापत्तनम केसानी ट्रेवल्स की बस से

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

आंध्र जैसे दक्षिण भारत के राज्यों के निजी बस आपरेटरों ने समयबद्ध सेवा की मिसाल पेश की है। ऐसा उत्तर भारत में नहीं देखने को मिलता। आमतौर पर जब आप दिल्ली में किसी एजेंट से बस बुक कराते हो तो मोटा कमिशन एजेंट के पास रह जाता है।

यमराज के चंपू से लोहा लें

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

कल मैंने नोएडा के एक मॉल में खाना खाते हुए उत्तराखंड के एक आईएएस अधिकारी की हृदयघात से मौत की कहानी लिखी थी। मैंने आपसे अनुरोध किया था कि आप मेरी इस कहानी को जितने लोगों तक पहुँचा सकें, पहुँचा दें।

सद्गति

प्रेमचंद : 

दुखी चमार द्वार पर झाडू लगा रहा था और उसकी पत्नी झुरिया, घर को गोबर से लीप रही थी। दोनों अपने-अपने काम से फुर्सत पा चुके थे, तो चमारिन ने कहा, 'तो जाके पंडित बाबा से कह आओ न। ऐसा न हो कहीं चले जायँ।'

सावित्री आसन है हृदयघात से बचाव

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

मेरी आज की पोस्ट को बहुत ध्यान से पढ़िएगा। आप इसे और लोगों से साझा भी कीजिएगा। आज की पोस्ट सिर्फ पोस्ट नहीं, बल्कि एक ऐसी जानकारी है जिसे हम सबको जानना और समझना चाहिए।

विजयवाड़ा शहर – पराठे और भरपेट थाली

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

आंध्र प्रदेश के शहरों में आमतौर पर भोजन की बात करें तो उसका मतलब भरपेट खाने की थाली होता है। यह थाली आमतौर पर चावल की होती है। विजयवाड़ा शहर में मार्च 2016 में भरपेट थाली मध्यम दर्जे के रेस्टोरेंट में मिल जाती है 70 रुपये की। यानी 70 रुपये में चाहे जितना मर्जी खाओ।

आर्य वैश्यों का तीर्थ पेनुगोंडा का वासवी धाम

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

आंध्र प्रदेश के राजमुंदरी जिले के पेनुगोंडा स्थित वासवी धाम दक्षिण भारत में आर्य वासव समुदाय के लोगों का बड़ा तीर्थ स्थल है। पेनुगोंडा को वासवी माता की जन्म स्थली माना जाता है। यहाँ पर विशाल वासवी कन्या परमेश्वरी मंदिर का निर्माण किया गया है। मंदिर परिसर में वासवी देवी की विशाल सुनहले रंग की मूर्ति है।

पैसा अधिक आने से नयी पीढ़ी पर असर

 संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

कभी-कभी ऐसा कुछ होता है कि आप सामने वाले से सिर्फ इतना ही कह पाते हैं, ‘वेरी गुड’। बहुत अच्छा किया आपने।
मेरी पहली दो लाइनों को पढ़ कर आप मन ही मन सोचेंगे कि संजय सिन्हा सुबह-सुबह पहली क्यों बुझा रहे हो, सीधे-सीधे मुद्दे पर क्यों नहीं आते।
सही बात है, सीधी बात का कोई मुकाबला नहीं होता।

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