मुंबई में पेट पूजा – आनंद भवन की शाकाहारी थाली

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस रेलवे स्टेशन के पास शाकाहारी खाने के लिए सबसे निकट में अच्छा विकल्प है, स्पेशल आनंद भवन। स्टेशन से बाहर निकलते ही मिंट रोड पर चलने पर दाहिनी तरफ स्पेशल आनंद भवन नजर आता है।
नई पीढ़ी के पेय और बचपन की यादें – पेपर बोट

संजय कुमार सिंह, संस्थापक, अनुवाद कम्युनिकेशन :
आज सुबह के अखबार में अमरूद और लाल मिर्च की इस फोटू ने पुराने दिन याद करा दिये। पिछले कई साल से अमरुद तो आराम से उपलब्ध है ही, लाल मिर्च की भी कोई कमी नहीं रही। पर ऐसे अमरुद नहीं खाया। खाया नहीं क्या किसी ने खिलाया ही नहीं। बचपन में अमरुद बेचने वाला पूछ कर और कई बार बिना पूछे भी अमरुद इस तरह काट कर लाल मिर्च भर देता था। आज यह तस्वीर देख कर वो सब स्वाद याद आ गया। पुराने दिन याद आ गये। खाक अच्छे दिन-पुराने दिन बहुत अच्छे थे।
माँ की गोद

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
मुझे मरने से डर नहीं लगता। पर मर जाने में मुझे सबसे बुरी बात जो लगती है, वो ये है कि आप चाह कर भी दुबारा उस व्यक्ति से नहीं मिल सकते, जिससे मिलने की तमन्ना रह जाती है।
पहाड़ों की तलहटी में बाउ कालेश्वर मंदिर

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
पहाड़ों की तलहटी में एक सुंदर सा मंदिर। मंदिर के एक तरफ झील तो दूसरी तरफ लहलहाते नारियल के पेड़। मुंबई की भीड़ भरी जिंदगी में इतना सुंदर मंदिर तो ईश्वर की अराधना में लीन होने का आनंद और भी बढ़ जाता है। कुछ ऐसा ही मुंबई के तुर्भे एमआईडीसी इलाके में स्थित बाऊ कालेश्वर का मंदिर। मंदिर परिसर में सफेद रंग के तीन खूबसूरत मंदिर बने हैं।
गलती को पुचकार कर सुधारें

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
कल रात सोते हुए मैं फूला नहीं समा रहा था कि मैंने कड़वी चाय को दुरुस्त करने की कला के साथ-साथ रिश्तों में प्यार के फूल खिलाने की विद्या भी आपको सिखलायी। मैंने कल जो पोस्ट लिखी थी, उसमें जिन्दगी का निचोड़ डाल दिया था।
कड़वे रिश्तों में मीठे बोल

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
लानत है मुझ पर। पिछले 26 सालों में कल पहला मौका था, जब मुझसे मेरी पत्नी ने कहा कि एक कप चाय बना कर पिला दो और मैं करवट बदल कर सो गया।
इगतपुरी में महाराष्ट्र का बड़ा पाव

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
हमारी यात्रा का दूसरा दिन है। मंगला लक्षदीप एक्सप्रेस में सुबह हुई तो मनमाड और नासिक पीछे छूट गए थे। मनमाड शिरडी के साईं बाबा जाने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन है। इगतपुरी नामक रेलवे स्टेशन आता है। इगतपुरी में ट्रेन 20 मिनट रूकी। सुबह नास्ते में मिला महाराष्ट्र का प्रसिद्ध बड़ा पाव। 15 रुपये में दो बड़ा पाव। कहीं 20 रुपये का तीन तो कहीं सात रुपये का एक भी।
सिंहस्थ कुंभ में श्रद्धालुओं का तांता

राकेश उपाध्याय, पत्रकार :
जिंदगी में अमृतत्व पाने की ये सबसे लंबी छलाँग है। जीवन की अनंत यात्रा से हमेशा के लिए पार उतरने के आकांक्षियों के सैलाब की ये सबसे गहरी डुबकी है। हजारों सालों से इसी तरह कुंभ में अमृत की दो बूंद पाने खिंचा चला आता है सनातन समाज शिप्रा किनारे बसी महाकाल की मोक्षदायिनी नगरी उज्जैन।
जलन छोड़, अपनी किस्मत बदलें

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
कुछ कहानियाँ पढ़ कर हंसी आती है। कुछ कहानियाँ पढ़ कर रोना आता है। जिन कहानियों को पढ़ कर हम हँसते या रोते हैं, उनके बारे में हम राय बना लेते हैं कि यह कहानी अच्छी है या बुरी है। पर हम यह सोचने की कोशिश नहीं करते कि हर कहानी कुछ न कुछ कहती है, संदेश देती है। जिस कहानी को सुन कर हमें कोई संदेश न मिले, वो कहानी उस फल की तरह है, जिसमें रस नहीं होता।
गर्मी में उधारी

आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
यह निबंध कक्षा आठ के उस बच्चे की कापी से लिया गया है, जिसने ग्रीष्मकालीन क्रियेटिव राइटिंग कंपटीशन में टाप किया है-
प्रेम करने वाला सबको संग लेकर चलते हैं

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
मेरी नौकरी पहले लगी थी, पत्रकारिता की पढ़ाई में दाखिला बाद में मिला था। जिन दिनों मैं पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था, एक लड़की से मेरी दोस्ती हुई। मेरी तरफ से दोस्ती सिर्फ दोस्ती तक सीमित थी, लेकिन अक्सर लड़कियाँ दोस्ती, प्रेम और शादी तीनों की चाशनी बना लेती हैं। उसने भी ऐसा ही किया और जिस दिन कॉलेज में मेरा आखिरी दिन था वो मेरे पास शादी का प्रस्ताव लेकर पहुँच गयी।
छिपाए गए सच में आदमी टूट कर गिरता है

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
मैं अपनी माँ से पूछा करता था कि माँ, आपकी शादी पिताजी से कैसे हुई?
माँ अपनी शादी को ईश्वरीय विधान बताती। कहती कि भगवानजी आये थे और उन्होंने सब तय कर दिया। बहुत से बच्चों की तरह मेरे मन में भी कौतूहल जगता कि माँ की शादी वाली तस्वीरों में मैं कहीं क्यों नहीं हूँ? माना कि मैं छोटा बच्चा रहा होऊँगा और मुमकिन है कि सो रहा होऊँगा, पर एक दो तस्वीरों में तो मुझे होना ही चाहिए था।



विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
संजय कुमार सिंह, संस्थापक, अनुवाद कम्युनिकेशन :
संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
राकेश उपाध्याय, पत्रकार :
आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :





