Thursday, March 19, 2026
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1903 में आरंभ हुआ था बराक घाटी रेलमार्ग

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

ब्रिटिश काल में साल 1882 से 1887 के बीच असम के बराक घाटी में लमडिंग बदरपुर के बीच रेल नेटवर्क स्थापित करने की योजना बनी। हालाँकि तब स्थानीय डिमासा जनजाति के लोग गोरों का अपने क्षेत्र में प्रवेश करने का काफी विरोध कर रहे थे। वे अपनी जीवन शैली में किसी बाहरी तकनीक का प्रवेश नहीं होने देना चाहते थे। पर इस विरोध की परवाह न करते हुए 25 अक्तूबर 1887 को गवर्नर जनरल ने इस क्षेत्र में रेल लाइन बिछाने की अनुमति प्रदान की। तब ब्रिटिश सरकार असम के पहाड़ी क्षेत्रों को चटगांव ( अब बांग्लादेश में) बंदरगाह को रेलवे से जोड़ना चाहती थी, जिससे एक विकल्प दिया जा सके और कोलकता बंदरगाह पर दबाव कम हो सके। साथ ही सरकार को लगता था ये रेल लाइन चाय बगानों से चाय की सप्लाई और कोयला ढुलाई के लिए मुफीद साबित होगी।

रेत पर दुख और पत्थर पर खुशियाँ उकेरें

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक : 

जा पाता हूँ। पर कई जगह जाना ही पड़ता है। 

बुनियादी विश्वास

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :

माँ की सुनायी कहानियों में सिंहासन बत्तीसी की पुतलियों की कहानियों की मेरे मन पर अमिट छाप है। 

रिश्ते तभी चलते हैं, जब दोनों छोड़ना जानते हों

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक : 

कुछ दिन पहले मैं अपने एक मित्र के घर गया था। मैं मित्र के घर बहुत दिनों के बाद गया था और इस उम्मीद से गया था कि मेरा मित्र मुझसे मिल कर बहुत खुश होगा।

शाम ढलने के साथ बढ़ती है मरीना बीच पर रौनक

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

शाम को ढलते हुए सूरज की रोशनी में मरीना बीच की रौनक देखने लायक होती है। यह संसार के सबसे लंबे समुद्र तटों में से एक है। शाम को चौपाटी सजी होती है और हजारों लोग बीच पर मौज मस्ती में जुटे रहते हैं। 

श्रीरंगपट्टनम का रंगनाथस्वामी मंदिर

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

वैसे तो श्रीरंगपट्टनम को टीपू सुल्तान के शहर के तौर पर जाना जाता है। लेकिन टीपू सुल्तान के महल के अवशेषों के बीच स्थित रंगनाथ स्वामी मंदिर का इतिहास और भी पुराना है। इस शहर का नाम ही रंगनाथ स्वामी के नाम पर पड़ा है। श्रीरंगपट्टनम मैसूर शहर से महज 19 किलोमीटर आगे बंगलुरु के रास्ते पर है। ऐतिहासिकता की दृष्टि से श्रीरंग पट्टनम दक्षिण भारत का महत्वपूर्ण स्थल है जो मध्य तमिल सभ्यताओं के केन्द्र बिन्दु के रूप में स्थापित था। कावेरी नदी के तट पर स्थित यह शहर इतिहास के कई कालखंड में काफी उन्नत शहर था।

वही कीजिए, जो अच्छा लगे

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :

मेरी शादी बहुत सामान्य ढंग से मेरे ढेर सारे दोस्तों की मौजूदगी में दिल्ली के आर्य समाज मंदिर में हुई थी। शादी के बाद जब मैं अपनी पत्नी के पिता से मिलने उनके घर गया तो उन्होंने मुझे समझाया कि जो हुआ सो हुआ, अब मुझे दोबारा धूमधाम से शादी करनी चाहिए। कुछ इस तरह शादी करनी चाहिए, जिसमें उनके और मेरे सभी रिश्तेदार मौजूद हों।

जार्ज पंचम, जार्ज टाउन, मद्रास और चेन्नई

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

चेन्नई के ब्राडवे बस स्टैंड के पास एनसी बोस रोड पर ब्रिटेन के सम्राट रहे जार्ज पंचम की विशाल प्रतिमा लगी है। चेन्नई में उनके नाम से जार्ज टाउन नामक इलाका भी है। यह चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन के पास स्थित चेन्नई का सबसे पुराना नगरीय क्षेत्र है। पर जार्ज टाउन का नाम कभी ब्लैकटाउन हुआ करता था।

धन, धान्य वैभव की देवी – अष्टलक्ष्मी मंदिर चेन्नई

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

चेन्नई के आडयार समुद्र तट पर अष्टलक्ष्मी का सुंदर मंदिर स्थित है। अष्टलक्ष्मी मंदिर  देवी  लक्ष्मी के आठ रूपों को समर्पित है। इन सभी के बारे में माना जाता है कि यह धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी की रूप है। देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु की पत्नी थी। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी लक्ष्मी हमारे जीवन में काफी महत्व है। अष्ट लक्ष्मी हमें धन, विद्या, वैभव, शक्ति और सुख प्रदान करती हैं।

चेन्नई का कपालेश्वर मंदिर – यहाँ पार्वती ने किया था तप

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

चेन्नई शहर में सबसे पुराना और प्रसिद्ध मंदिर है कपालेश्वर मंदिर। ये महादेव शिव का मंदिर है। साल का कोई भी दिन हो यहाँ हमेशा श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। कपालेश्वर मंदिर चेन्नई के मैलापुर इलाके में स्थित है। मंदिर के सामने एक विशाल सरोवर है। आसपास में घना बाजार है।

रिश्तों की पूंजी

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :

आज मैं जो सुनाने जा रहा हूँ, वो कहानी नहीं। हकीकत है। हमारा और आपका भविष्य है, अगर हम समय रहते नहीं चेते तो।

मुक्ति-मार्ग

प्रेमचंद :

सिपाही को अपनी लाल पगड़ी पर, सुन्दरी को अपने गहनों पर और वैद्य को अपने सामने बैठे हुए रोगियों पर जो घमंड होता है, वही किसान को अपने खेतों को लहराते हुए देखकर होता है। झींगुर अपने ऊख के खेतों को देखता, तो उस पर नशा-सा छा जाता। तीन बीघे ऊख थी। इसके 600 रु. तो अनायास ही मिल जायेंगे। और जो कहीं भगवान् ने डाड़ी तेज कर दी तो फिर क्या पूछना ! दोनों बैल बुड्ढे हो गये। अबकी नयी गोई बटेसर के मेले से ले आयेगा। कहीं दो बीघे खेत और मिल गये, तो लिखा लेगा। रुपये की क्या चिंता। बनिये अभी से उसकी खुशामद करने लगे थे। ऐसा कोई न था जिससे उसने गाँव में लड़ाई न की हो। वह अपने आगे किसी को कुछ समझता ही न था।

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