जम्हाई लेते जंगलों के बीच ओरछा

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
बलखाती बेतवा, जम्हाई लेते जंगलों के बीच छिपा है ओरछा। वैसे ओरछा का मतलब ही होता है छिपा हुआ। तो छिपा हुआ सौंदर्य ही है ओरछा, जिसकी तलाश में दुनिया भर से सैलानी यहाँ पहुँचते हैं। मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले का शहर। पर टीकमगढ़ यहाँ से 90 किलोमीटर है। यूपी का झांसी शहर 16 किलोमीटर है। इसलिए ओरछा पहुँचे का सुगम रास्ता उत्तर प्रदेश के झांसी शहर से है।
लैला

प्रेमचंद :
यह कोई न जानता था कि लैला कौन है, कहाँ से आयी है और क्या करती है। एक दिन लोगों ने एक अनुपम सुंदरी को तेहरान के चौक में अपने डफ पर हाफ़िज की यह ग़जल झूम-झूम कर गाते सुना-
रसीद मुज़रा कि ऐयामे ग़म न ख्वाहद माँद,
चुनाँ न माँद, चुनीं नीज़ हम न ख्वाहद माँद।
परंपराओं की जंजीरों में जकड़ी लड़कियाँ

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
आइए आज आपको एक लड़की से मिलवाता हूँ।
दिल्ली में हंड्रेड परसेंट

आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
एक अखबार में छपी रिपोर्ट ने बताया कि दिल्ली में 64.36% मकान मालिक हैं। 31% किरायेदार हैं। दिल्ली में ये कुछ कुछ गोत्र टाइप मामला है, मकान मालिक ऊंचे गोत्र का, किरायेदार उससे नीचे गोत्र का।
बदलाव की बयार – महात्मा गाँधी सेवा आश्रम जौरा

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
चंबल घाटी में मुरैना शहर से 25 किलोमीटर आगे छोटे से कस्बे में स्थित महात्मा गाँधी सेवा आश्रम जौरा वह जगह है जो देश भर के हजारों लाखों युवाओं को प्रेरणा देती है। इस आश्रम की स्थापना 1970 में हुई। दरअसल महान गाँधीवादी सुब्बराव महात्मा गाँधी के जन्म शताब्दी वर्ष पर चलायी गयी प्रदर्शनी ट्रेन के प्रभारी थे।
प्यार सबसे बड़ी प्रेरणा

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
एक बार मैंने अमिताभ बच्चन से पूछा था कि वो कौन सी चीज है जो आपको लगातार सिनेमा के संसार से जुड़े रहने को प्रेरित करती है? हर आदमी एक ही काम करते-करते एक दिन उस काम से ऊब जाता है। मैंने तमाम बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों को देखा है, जो एक दिन खुद को रिटायर होते देखना चाहते हैं।
दुर्गा पूजा@ मेरा गांव

सुशांत झा, पत्रकार :
पता नहीं कितने साल हुए दुर्गा पूजा में गाँव गये हुए। हमारे यहाँ दशहरा नहीं बोलते हैं, दुर्गा पूजा या नवरात्रा बोलते थे। हद से हद दशमी। कलश स्थापन से ही पूजा शुरू। बेल-नोती और बेल तोड़ी..फिर बलि-प्रदान, मेला।
‘फेरिहा’

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
'फेरिहा' एक चौकीदार की बेटी का नाम है। टर्की में रहने वाली फेरिहा मेहनत और लगन से अच्छे कॉलेज में दाखिला पा लेती है और खूब पढ़ना चाहती है। लेकिन उसके पिता को उसकी शादी की चिंता है। उन्होंने अपनी बिरादरी और हैसियत जैसे एक परिवार के लड़के को फेरिहा के लिए पसंद कर रखा है। पिता की निगाह में वही लड़का फेरिहा के लिए उपयुक्त है। वो जानते हैं कि वो लड़का भी फेरिहा को पसंद करता है, उसकी सुंदरता पर मरता है।
बदलाव ही जीवन है

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
दशहरा के महीना भर पहले हमारे घर में सुगबुगाहट शुरू हो जाती थी। मुझे नहीं पता कि घर के बाकी लोग दशहरा का इंतजार क्यों करते थे, पर मैं दशहरा का इंतजार नहीं करता था। माँ सुबह से ही ढेर सारी खाने-पीने की चीजें बनाने में जुट जाती, पिताजी पूजा की तैयारी करते। लेकिन दशहरा का दिन मेरे लिए उदासी का सबब होता। हालाँकि दशहरा पर नये कपड़े पहनने को मिलते थे, पर मेरा मन यह सोच कर उदास रहता कि आज दुर्गा जी की मूर्ति उठ जाएगी, आज उसे नदी में बहा दिया जाएगा और पिछले नौ दिनों से जो उत्सव चल रहा था, वो खत्म हो जाएगा।
प्यार, परवाह और भरोसा

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
पिछले हफ्ते हम अपनी बहन के ससुर के श्राद्ध में शामिल होने के लिए पटना गये थे। हम यानी मैं और मेरी पत्नी।
तेंतर

प्रेमचंद :
आखिर वही हुआ जिसकी आशंका थी; जिसकी चिंता में घर के सभी लोग विशेषतः प्रसूता पड़ी हुई थी। तीन पुत्रों के पश्चात् कन्या का जन्म हुआ। माता सौर में सूख गयी, पिता बाहर आँगन में सूख गये, और पिता की वृद्धा माता सौर द्वार पर सूख गयीं। अनर्थ, महाअनर्थ ! भगवान् ही कुशल करें तो हो ? यह पुत्री नहीं राक्षसी है। इस अभागिनी को इसी घर में आना था ! आना ही था तो कुछ दिन पहले क्यों न आयी। भगवान् सातवें शत्रु के घर भी तेंतर का जन्म न दें।
बंद हुई जबलपुर नैनपुर नैरोगेज

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
और सतपुड़ा एक्सप्रेस का रोमांचक सफर हमेशा के लिए थम गया। एक अक्टूबर 2015 से जबलपुर-नैनपुर खंड छोटी लाइन को बंद कर दिया गया है। ऐसे में इस पटरी पर रोजाना दौड़ने वाली 24 ट्रेनों का सफर हमेशा के लिए खत्म हो गया है। इसके साथ ही 111 साल का शानदार सफर इतिहास बन गया। न सिर्फ सतपुड़ा एक्सप्रेस बल्कि तमाम ट्रेनें अब इतिहास के पन्नों का हिस्सा बन चुकी हैं।



विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
प्रेमचंद :
आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
सुशांत झा, पत्रकार :





