जीवन और मृत्यु का पाठ पढ़ाने वाले गुरु श्रीकृष्ण
संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
कभी नहीं,
इस आत्मा को,
खण्ड-खण्ड कर सकते हैं
हथियार।
कभी नहीं,
इस आत्मा को
जला सकती है
अग्नि।
कभी नहीं
भी
इस आत्मा को
भिगो सकता है,
जल।
कभी नहीं,
सुखा सकती है,
वायु।
***
जीवन कुछ नहीं होता

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
देखो मैंने देखा है ये एक सपना, फूलों के शहर में है घर अपना
गृह-नीति

प्रेमचंद :
जब माँ, बेटे से बहू की शिकायतों का दफ्तर खोल देती है और यह सिलसिला किसी तरह खत्म होते नजर नहीं आता, तो बेटा उकता जाता है और दिन-भर की थकान के कारण कुछ झुँझलाकर माँ से कहता है,
मुगल सल्तनत की कहानी सुनाता लाल किला

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
लाल किला यानी सदियों से इतिहास के पन्नों में कई तरह के उतार-चढ़ाव का साक्षी। यमुना नदी के किनारे बना ये किला तभी दिखायी देता है जब आपकी ट्रेन पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन में प्रवेश करने वाली होती है। अगर कोई दिल्ली घूमने आता है तो वह लाल किला जरूर जाता है।
दशरथ माँझी ने की थी गया से दिल्ली तक पदयात्रा

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
पहाड़ का सीना चीर कर सड़क बनाने वाले दशरथ माँझी के जीवन पर अत्यंत खूबसूरत फिल्म बनी है माँझी द माउंटेन मैन। माँझी ने अपने जीवन काल में एक बार रेलवे ट्रैक से होते हुए पैदल ही गेहलौर से दिल्ली की 1400 किलोमीटर की दूरी तय की थी।
नेऊर

प्रेमचंद :
आकाश में चांदी के पहाड़ भाग रहे थे, टकरा रहे थे गले मिल रहें थे, जैसे सूर्य मेघ संग्राम छिड़ा हुआ हो। कभी छाया हो जाती थी कभी तेज धूप चमक उठती थी। बरसात के दिन थे। उमस हो रही थी । हवा बदं हो गयी थी।
अहंकार मिटाता है

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
कल मेरे दफ्तर में अनिल कपूर और जॉन अब्राहम आये थे। दोनों अलग-अलग गाड़ियों में थे। जॉन गाड़ी से पहले उतर गए, अनिल किसी से फोन पर बात कर रहे थे। मैं जॉन को लेकर गेस्ट रूम में चला गया और वहाँ उन्हें बिठा दिया। मैं उनसे चाय-कॉफी पूछ ही रहा था कि अपनी बात खत्म कर अनिल कपूर भी कमरे में चले आये।
बेटे नहीं होने से वंश खत्म नहीं होता

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
कभी-कभी हम किसी के मुँह से ऐसा कुछ सुन लेते हैं कि मन खिल उठता है।
आम आदमी की पहली उड़ान

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
आसमान में उड़ना भला किसे अच्छा नहीं लगता। हर कोई सोचता है कि काश उसके पास भी पंछियों की तरह परवाज होते और उड़ पाता। पर देश की आबादी के 2% लोग भी जीवन में उड़ पाते हैं। शायद नहीं। आप उड़कर दिल्ली से हैदराबाद दो घंटे में पहुँच सकते हैं पर ट्रेन से 20 घंटे में। पर उड़ना हमेशा महँगा सौदा रहा है। पर हम उस आदमी को कैसे भूल सकते हैं जिसने मध्य वर्ग के लोगों को उड़ने का सपना दिखाया।
समंदर की सैर

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
बहुत से लोग कभी बड़े नहीं होते। मैं भी उनमें से एक हूँ।
बहन की पाती भाइयों के नाम : अगले साल जरूर आना

पद्मपति शर्मा, वरिष्ठ खेल पत्रकार :
हम चार भाइयों के परिवार में कुल छह बेटे और छह बेटियों में सबसे छोटी है श्वेता। बीस बरस की श्वेता राखी के दिन उदास थी। अकेले कमरें में आँसुओं के बीच उसने अपना दर्द कविता में उड़ेल दिया। छह मे तीन भाई विदेश में तो बचे तीन दूसरे शहरों में। चिकन पाक्स हो जाने से बंगलोर में निफ्ट से फैशन डिजाइनिंग कर रही श्वेता हास्टल से बाहर नहीं निकली। डर था कि घर जाने से माँ इन्दिरा, भाभी रिंकू, भतीजी मिहिका और भतीजा प्रांशु भी कहीं चेचक की चपेट में न आ जाएँ।
डामुल का कैदी

प्रेमचंद :
दस बजे रात का समय, एक विशाल भवन में एक सजा हुआ कमरा, बिजली की अँगीठी, बिजली का प्रकाश। बड़ा दिन आ गया है। सेठ खूबचन्दजी अफसरों को डालियाँ भेजने का सामान कर रहे हैं। फलों, मिठाइयों, मेवों, खिलौनों की छोटी-छोटी पहाड़ियाँ सामने खड़ी हैं।



प्रेमचंद :
पद्मपति शर्मा, वरिष्ठ खेल पत्रकार :





