दो बैलों की कथा

प्रेमचंद :
जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुद्धिमान समझा जाता है। हम जब किसी आदमी को पहले दर्जे का बेवकूफ कहना चाहते हैं, तो उसे गधा कहते हैं। गधा सचमुच बेवकूफ है या उसके सीधेपन, उसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। गायें सींग मारती हैं, ब्याही हुई गाय तो अनायास ही सिंहनी का रूप धारण कर लेती है।
पैसा और शांति

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
मेरी एक परिचित इन दिनों बहुत परेशान है और मुझसे मदद चाहती हैं। मैं दिल से उनकी मदद करना चाहता हूँ, लेकिन कुछ कर नहीं पा रहा।
सुन्दर और बहुत सुन्दर

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
महिलाएँ या तो सुन्दर होती हैं, या बहुत सुन्दर।
विद्रोही

प्रेमचंद :
आज दस साल से जब्त कर रहा हूँ। अपने इस नन्हे-से ह्रदय में अग्नि का दहकता हुआ कुण्ड छिपाये बैठा हूँ। संसार में कहीं शान्ति होगी, कहीं सैर-तमाशे होंगे, कहीं मनोरंजन की वस्तुएँ होंगी; मेरे लिए तो अब यही अग्निराशि है और कुछ नहीं। जीवन की सारी अभिलाषाएँ इसी में जलकर राख हो गयीं। किससे अपनी मनोव्यथा कहूँ ? फायदा ही क्या ? जिसके भाग्य में रुदन, अनंत रुदन हो, उसका मर जाना ही अच्छा।
कोच्चि : यहाँ है वास्को डी गामा की मजार

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
फोर्ट कोच्चि से गुजरते हुए हमें एक चर्च दिखायी देता है, इस चर्च में पुर्तगाली यात्री वास्को डी गामा की मजार है। हम स्कूली किताबों में पढ़ते आये हैं कि वास्को डी गामा ने भारत को खोजा। पर यह आधा सच है। क्या वास्को डी गामा से पहले भारत नहीं था। वास्तव में वास्को डी गामा ने यूरोप से भारत का समुद्री रास्ता भर खोजा था।
गोविंदाजी, अनिल कपूरजी का पड़ोस

आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
प्रख्यात फिल्म अभिनेता गोविंदाजी एक इश्तिहार में दिल्ली-एनसीआर में एक घर के बारे में बता रहे थे कि उस हाउसिंग परियोजना में घर लेना कितना फायदेमंद हैं। गोविंदाजी मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में ज्यादा काम नहीं कर रहे हैं, दिल्ली सैटल होने की सोच रहे हैं, ऐसा लगता है। गोविंदाजी का पड़ोस कैसा होगा, सोचने का विषय है। गोविंदाजी के पास टाइम बहुत है इन दिनों में, सोचता हूँ कि गोविंदाजी के पड़ोस में मकान ले लूँ, तो उनसे संवाद कैसे होगा-
पैगाम

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
पिछली बार दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले से मैं कुरआन मजीद ले आया था। मेरा बहुत दिनों से मन था कि मैं कुरआन पढ़ूँ। स्कूल के दिनों में मैं चक्रवर्ती का अंक गणित और कॉलेज के दिनों में एन सुब्रह्मण्यम की लिखी फिजिक्स की किताब उपन्यास की तरह पढ़ जाता था। इतिहास, भूगोल और अर्थशास्त्र तो हफ्ते भर से ज्यादा की खुराक कभी नहीं रहे। ऐसे में क़ुरआन मजीद मेरे पास कैसे पड़ी रह गयी और मैंने क्यों इसे तभी नहीं पढ़ लिया ये मेरे सोचने का विषय है।
मिस पद्मा

प्रेमचंद :
कानून में अच्छी सफलता प्राप्त कर लेने के बाद मिस पद्मा को एक नया अनुभव हुआ, वह था जीवन का सूनापन। विवाह को उसने एक अप्राकृतिक बंधन समझा था और निश्चय कर लिया था कि स्वतन्त्र रहकर जीवन का उपभोग करूँगी। एम.ए. की डिग्री ली, फिर कानून पास किया और प्रैक्टिस शुरू कर दी। रूपवती थी, युवती थी, मृदुभाषिणी थी और प्रतिभाशालिनी भी थी। मार्ग में कोई बाधा न थी। देखते-देखते वह अपने साथी नौजवान मर्द वकीलों को पीछे छोड़कर आगे निकल गयी और अब उसकी आमदनी कभी-कभी एक हज़ार से भी ऊपर बढ़ जाती।
गोवा के थिविम रेलवे स्टेशन पर रोटियाँ

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
साल 2012 के अक्तूबर माह में दक्षिण भारत का सफर। 12618 मंगला लक्षदीप एक्सप्रेस वैसे थो थिविम स्टेशन पर 7.12 बजे शाम पहुँचती है पर वह दो घंटे लेट थी। लिहाजा खाने का समय हो गया था। पेट में चूहे खूब कूद रहे थे। थिविम गोवा का एक रेलवे स्टेशन है। ट्रेन का ठहराव महज दो मिनट का है। 21 मीटर समुद्र तल से ऊँचाई पर थिविम छोटा सा स्टेशन है दो प्लेटफार्म हैं यहाँ पर।
विरासत की याद – काँगड़ा घाटी रेलवे का स्टीम लोकोमोटिव

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
काँगड़ा के रेल में सेवा देने वाले स्टीम लोकोमोटिव में जेडएफ 107 की चर्चा महत्वपूर्ण है। यह नैरोगेज रेलवे सिस्टम का एक शक्तिशाली लोकोमोटिव था। काँगड़ा घाटी रेलवे को लंबे समय तक सेवाएँ देने वाला एक लोकोमोटिव इन दिनों नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन के पहाड़ गंज वाले निकास द्वार के पास आराम फरमा रहा है।
सोच में बदलाव

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
कल मैंने लिखा था कि मुझसे मेरे एक परिचित ने पूछा था कि फेसबुक पर रोज लिख कर मैं अपना समय क्यों जाया करता हूँ, तो मैंने बता दिया था कि यही वो मेला है, जहाँ मुझे अपने सारे खोया हुए रिश्ते मिले हैं।
कैदी

प्रेमचंद :
चौदह साल तक निरन्तर मानसिक वेदना और शारीरिक यातना भोगने के बाद आइवन ओखोटस्क जेल से निकला; पर उस पक्षी की भाँति नहीं, जो शिकारी के पिंजरे से पंखहीन होकर निकला हो बल्कि उस सिंह की भाँति, जिसे कठघरे की दीवारों ने और भी भयंकर तथा और भी रक्त-लोलुप बना दिया हो।



प्रेमचंद :
संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :





