विकल्प न हो तो, जो है उसमें खुश रहिये

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
मेरे फुफेरे भाई के पास एक जोड़ी हवाई चप्पल थी। चप्पल क्या, समझिए ऊपर रंग उतरा हुआ फीता था, नीचे घिसी हुई ऐड़ी थी। ऐड़ी इतनी घिसी हुई कि पाँव फर्श छूता था। लेकिन थी चप्पल।
बापू ने डाली थी बुनियादी शिक्षा की नींव

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
बेतिया शहर के पास कुमारबाग के पास है वृंदावन आश्रम। यह वही आश्रम है, जहाँ बापू पन्डित प्रजापति मिश्र, गुलाब खाँ व पीर मुहम्मद मुनिस के द्वारा निमन्त्रण पर गाँधी सेवा संघ के पंचम अधिवेशन के के मौके पर 2 मई, 1939 को एक बार फिर चंपारण की धरती पर पहुँचे थे।
धिक्कार

प्रेमचंद :
अनाथ और विधवा मानी के लिये जीवन में अब रोने के सिवा दूसरा अवलंब न था। वह पाँच वर्ष की थी, जब पिता का देहांत हो गया। माता ने किसी तरह उसका पालन किया।
बापू के भितिहरवा आश्रम की ओर

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
सुबह-सुबह मैं नरकटियागंज के पुरानी बाजार के थाना चौक पहुँचता हूँ। यहाँ से कई ग्रामीण क्षेत्रों में जाने के लिए आँटो रिक्शा चलते हैं। गवनहा तक जाने वाले आँटो रिक्शा भितिहरवा जाते हैं। किराया है 20 रुपये।
दिल की रानी

प्रेमचंद :
जिन वीर तुर्कों के प्रखर प्रताप से ईसाई-दुनिया काँप रही थी, उन्हीं का रक्त आज कुस्तुन्तुनिया की गलियों में बह रहा है। वही कुस्तुन्तुनिया जो सौ साल पहले तुर्कों के आतंक से आहत हो रहा था, आज उनके गर्म रक्त से अपना कलेजा ठंडा कर रहा है। और तुर्की सेनापति एक लाख सिपाहियों के साथ तैमूरी तेज के सामने अपनी किस्मत का फैसला सुनने के लिये खड़ा है।
यादें – 11

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
एक राजा था। दुष्ट और महामूर्ख था। एकबार एक साधु ने उसे दिव्य वस्त्र दिया और कहा कि ये ऐसा वस्त्र है, जो सिर्फ उसी व्यक्ति को नजर आयेगा, जिसकी आत्मा में छल-कपट न हो, जो अच्छा व्यक्ति हो। ऐसा कह कर उसने राजा के सारे कपड़े उतरवा दिये और उसे दिव्य वस्त्र पहना दिया।
ज्योति

प्रेमचंद :
विधवा हो जाने के बाद बूटी का स्वभाव बहुत कटु हो गया था। जब बहुत जी जलता तो अपने मृत पति को कोसती-आप तो सिधार गए, मेरे लिए यह जंजाल छोड़ गए । जब इतनी जल्दी जाना था, तो ब्याह न जाने किसलिए किया । घर में भूनी भॉँग नहीं, चले थे ब्याह करने !
भितिहरवा आश्रम : यहाँ से दी बापू ने अंग्रेजों को चुनौती

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
चंपारण की धरती को वह गौरव प्राप्त है, जहाँ से महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश राज को चुनौती दी। इसके साथ ही आधुनिक भारत के इतिहास में गाँधी युग की शुरुआत होती है। 1917 का वह साल जब देश के आजादी के आंदोलन के इतिहास के केंद्र में महात्मा गाँधी आ जाते हैं।
गुल्ली-डंडा

प्रेमचंद :
हमारे अँग्रेजी दोस्त मानें या न मानें मैं तो यही कहूँगा कि गुल्ली-डंडा सब खेलों का राजा है। अब भी कभी लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलते देखता हूँ, तो जी लोट-पोट हो जाता है कि इनके साथ जाकर खेलने लगूँ। न लान की जरूरत, न कोर्ट की, न नेट की, न थापी की। मजे से किसी पेड़ से एक टहनी काट ली, गुल्ली बना ली, और दो आदमी भी आ जाए, तो खेल शुरू हो गया।
हरा-भरा चंपारण, अब नहीं रहा मिनी चंबल

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
किसी जमाने में चंपारण को मिनी चंबल कहा जाता था। पर अब हालात बदल गये हैं।
विंडोज का ताजमहल

आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
घर के दरवाजे दादाजी बनवा गये थे, सो चले जा रहे हैं, विंडोज हमारी जनरेशन का काम था, 1998 से अब तक जाने कित्ती बार बदलवानी पड़ीं।
इमरजंसी – एक याद (4)

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
मैंने कहीं पढ़ा था कि एक बार एक अमेरिकी, जो घनघोर नास्तिक था, भारत घूमने आया और यहाँ से वापस जाते हुए वो अपने साथ भगवान की एक मूर्ति लेकर गया। लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ कि ये नास्तिक अमेरिकी भला भारत से भगवान की मूर्ति क्यों खरीद लाया है। लोगों ने उससे पूछा कि भाई, इस मूर्ति में ऐसी क्या बात है।



संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
प्रेमचंद :
आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :





