नकल की अकल वाया बिहार पॉलटिक्स

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सुशांत झा, पत्रकार : 

सन् 1996 में पटना हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था कि अगर स्कूली परीक्षाओं में नकल की खबरें आयीं तो उस जिले का कलक्टर जिम्मेवार होगा! ऐसे में तमाम कलक्टरों ने अपनी गरदन बचाने के लिए भारी कड़ाई की थी और मुझे याद है कि उस जमाने में नकल वाले बच्चों को पुलिस अपराधी की तरह ले जाती थी और 2000 रुपये देकर ही जमानत मिल पाता थी।

लालू यादव का वो घनघोर राज था, वे अजेय लगते थे। बल्कि थे ही। उन्होंने दसवीं की परीक्षा में से अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म कर अपने हिसाब से गरीब-गुरबों का दिल ही जीत लिया था। बिहार बोर्ड के बच्चे अंग्रेजी में पहले से ही कमजोर थे, उसके बाद से तो मानों उनका अंग्रेजी पढ़ना ही छूट गया जो जागरूक नहीं थे। लोगों ने कहा कि लालू ने कर्पूरी डिविजन लागू कर दिया है, यानी गरीब-गुरबों का दिल जीतने के लिए ऐसे ही कर्पूरी ने किया था। वो जमाना तो हमने नहीं देखा था, लेकिन सन् 1995 तक बिहार की स्कूली परीक्षाओं में जमकर नकल चली। ऐसा नहीं था कि लालू के आने के बाद ऐसा हुआ, ऐसा पहले भी होता था। लालू जी ने उसे मौन सहमति दे दी। पटना हाईकोर्ट ने इसलिये वो निर्देश तमाम कलक्टरों को दिया था।

आज वैशाली के स्कूल की जो तस्वीर सोशल मीडिया और मीडिया में वाइरल हुयी है, उसमें असली खबर ये होनी चाहिये कि क्या हाईकोर्ट ने कलक्टरों को तलब किया? क्या कोई कार्रवाई हुयी? क्या बिहार में गरीबों के नेता बनने के लिए स्कूली परीक्षा में नकल को बढ़ावा देकर ही गरीबों का दिल जीता जायेगा या कायदे के वेतन पर कायदे के शिक्षक भी बहाल होंगे? उत्तर प्रदेश में भी जब उस जमाने में मुलायम की सरकार आती थी तो नकल में छूट दी जाती थी, पता नहीं अब क्या हाल है। राजनाथ सिंह को तो पहली प्रसिद्धि ही इसलिये मिली (क्या उसके बाद भी कोई मिली?) कि उन्होंने नकल पर रोक लगवाया था! तो क्या ये समाजवादी नेता होते ही ऐसे हैं कि नकल में छूट को गरीबों के लिए तोहफा मान के चलते हैं? हालाँकि ऐसा सरलीकरण करना तो नहीं चाहिये, क्योंकि हरियाणा, उड़ीसा, कर्नाटक आदि प्रांतों में लंबे समय तक समाजवादी परिवार की सरकारें रहीं हैं- वहाँ तो ऐसा नहीं होता। तो फिर ये बिहार-यूपी वाले नेताओं को किसने भांग खिला दिया है।

लगता है इनके लिए पॉलटिक्स ही मैगी पॉलटिक्स है – जो चार मिनट में बनकर तैयार हो जाये। बिना ठोस काम के वोट मिलता रहे। सुशासन बाबू, आपका रिकॉर्ड तो ऐसा न था, आप क्यों असुरक्षित सा व्यवहार कर रहे हैं?

(देश मंथन, 20 मार्च 2015)

 

 

 

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