Wednesday, March 18, 2026
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खजियार से पुखरी गाँव की सैर

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

खजियार ग्राउंड के आसपास देवदार के घने जंगल हैं। इन जंगलों में ट्रैकिंग करने का अपना मजा है। अगर आपके पास समय है तो घूमने के लिए वक्त निकालें। एक सुबह हमलोग टहलने निकले। यह खजियार ग्राउंड में पीडब्लूडी गेस्ट हाउस के पीछे का इलाका था। इस सड़क पर चलते हुए आगे कोई गाँव आता है। पर गाँव से पहले रास्ते में दो चार होटल हैं। ये होटल ऐसे हैं जहाँ आप कोलाहाल से दूर प्रकृति की गोद में कुछ वक्त गुजार सकते हैं।

खजियार – स्विटजरलैंड 6194 किलोमीटर…

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

खजियार यानी सपनीली दुनिया। दस से ज्यादा हिंदी फिल्मों में खजियार के सौंदर्य को समेटने की कोशिश फिल्मकारों ने की है। खजियार हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले का एक गाँव है, जिसे हिल स्टेशन का दर्जा प्राप्त है। यह 1920 मीटर की ऊँचाई पर है। यह डलहौजी से भी 24 किलोमीटर है और चंबा शहर से भी 28 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। तीन किलोमीटर की परिधि में एक बड़ा हरा भरा ग्राउंड है। इस ग्राउंड के बीचों बीच झील है। इस झील को गाँव के लोग पवित्र और रहस्यमय भी मानते हैं।

सभ्यता का रहस्य

प्रेमचंद : 

यों तो मेरी समझ में दुनिया की एक हजार एक बातें नहीं आती-जैसे लोग प्रात:काल उठते ही बालों पर छुरा क्यों चलाते हैं ? क्या अब पुरुषों में भी इतनी नजाकत आ गयी है कि बालों का बोझ उनसे नहीं सँभलता ? एक साथ ही सभी पढ़े-लिखे आदमियों की आँखें क्यों इतनी कमजोर हो गयी है ? दिमाग की कमजोरी ही इसका कारण है या और कुछ? लोग खिताबों के पीछे क्यों इतने हैरान होते हैं ? इत्यादि-लेकिन इस समय मुझे इन बातों से मतलब नहीं। मेरे मन में एक नया प्रश्न उठ रहा है और उसका जवाब मुझे कोई नहीं देता।

रोटी, कपड़ा और मकान

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

हमारे शहर में फिल्म लगी थी रोटी, कपड़ा और मकान। रिक्शा पर लाऊडस्पीकर लगा कर एक आदमी आता और माइक पर अनाउंस करता, आपके शहर के रूपम सिनेमा हॉल में लगातार पच्चीस हफ्तों से धूम मचा रहा है, ‘रोटी, कपड़ा और मकान’। वो इतना बोलता और फिर लाउडस्पीकर पर गाना बजता— “तेरी दो टकिए की नौकरी, मेरा लाखों का सावन जाए…।”

सवा सेर गेहूँ

प्रेमचंद : 

किसी गाँव में शंकर नाम का एक कुरमी किसान रहता था। सीधा-सादा गरीब आदमी था, अपने काम-से-काम, न किसी के लेने में, न किसी के देने में। छक्का-पंजा न जानता था, छल-प्रपंच की उसे छूत भी न लगी थी, ठगे जाने की चिन्ता न थी, ठगविद्या न जानता था, भोजन मिला, खा लिया, न मिला, चबेने पर काट दी, चबैना भी न मिला, तो पानी पी लिया और राम का नाम लेकर सो रहा। किन्तु जब कोई अतिथि द्वार पर आ जाता था तो उसे इस निवृत्तिमार्ग का त्याग करना पड़ता था। विशेषकर जब साधु-महात्मा पदार्पण करते थे, तो उसे अनिवार्यत: सांसारिकता की शरण लेनी पड़ती थी। खुद भूखा सो सकता था, पर साधु को कैसे भूखा सुलाता, भगवान् के भक्त जो ठहरे !

डलहौजी से मिनी स्विटजरलैंड की ओर…

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

हमारी अगली मंजिल थी खजियार। हिमाचल प्रदेश का स्विटरजरलैंड। जहाँ हमने अगले तीन दिन रहना तय किया था। बड़ी संख्या में ऐसे सैलानी होते हैं जो डलहौजी में रुकते हैं। यहीं से गाड़ी बुक करके खजियार जाते हैं। वहाँ चार घंटे गुजारने के बाद लौट आते हैं। पर हमारी योजना तो वहाँ कुछ दिन और रात गुजराने की थी।

डलहौजी : बावड़ी का पानी पीकर स्वस्थ हुए सुभाष बाबू

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

यह 1937 की बात है। महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस को जेल में अंगरेजी सरकार की यातना के दौर में टीबी की बीमारी हो गयी। तब डाक्टरों ने उन्हें स्वास्थ्य लाभ के लिए किसी ठंडी जगह में जा कर रहने की सलाह दी।

सदमा या आजादी

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

आपको बताया था न कि पिछले दिनों जब मैं कान्हा में टाइगर देखने गया था, उस रात जंगल के गेस्ट हाउस की बत्ती चली गयी थी। अब टाइगर तो वहाँ मिले नहीं, हाँ, पड़ोस के कमरे में एक डॉक्टर मिल गये। 

मनमोह लेती डलहौजी की आबोहवा

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

डलहौजी की आबोहवा ऐसी है जो लोगों को पसंद आती है। हमें सुभाष चौक पर एक अवकाशप्राप्त दंपति मिले जो एक महीने से आ कर डलहौजी में पड़े हैं। कमरा किराये पर ले लिया है। यहाँ से जाना नहीं चाहते। सुभाष प्रतिमा के पास दोपहर में मीठी धूप के मजे ले रहे हैं। 

प्रतिष्ठा पर चोट पहुँचाने से सत्य को जानना जरूरी

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

अगर मैंने ये कहानी अपने कानों से नहीं सुनी होती तो मुझे कभी अपने पत्रकार होने की शर्मिंदगी के उस अहसास से नहीं गुजरना पड़ता, जिससे मैं दो दिन पहले गुजरा हूँ। कहानी मुझे एक डॉक्टर ने सुनाई और पहली बार मुझे इस कहानी को सुनते हुए आत्मग्लानि सी हो रही थी। मुझे लग रहा था कि कहीं चुल्लू भर पानी मिल जाए तो फिर कभी किसी को अपना मुँह भी न दिखाऊँ। 

गेटवे ऑफ चंबा – बनीखेत

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

बनीखेत में ठहरने के कई कारण थे। पहला की बनीखेत डलहौजी से छह किलोमीटर पहले है, जो लोग पहाड़ों की चकरघिन्नी वाले रास्ते पर लंबा सफर नहीं करना चाहते उन्हें जल्दी ब्रेक मिल जाता है। दूसरा अगर डलहौजी घूमना है बनीखेत में रूक कर भी घूमा जा सकता है। बनीखेत से डलहौजी महज 6 किलोमीटर है। 10 मिनट में किसी भी बस से पहुँच जाइए। ठहरने के लिए बनीखेत में भी कई होटल और गेस्ट हाउस हैं। बनीखेत में होटल डलहौजी की तुलना में किफायती है। 

परमपावन धाम श्री सिद्धबली हनुमान मंदिर – कोटद्वार

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

कोटद्वार शहर के बाहर पहाड़ की तलहटी में खोह नदी के किनारे स्थित है सिद्धबली हनुमान मंदिर। यह स्थान तीन तरफ से वनों से ढका हुआ बड़ा रमणीक है। सड़क से मंदिर तक पहुँचने के लिए खोह नदी पर पुल बना हुआ है। गढ़वाल के प्रवेश द्वार कोटद्वार कस्बे से कोटद्वार-पौड़ी राजमार्ग पर लगभग तीन किलोमीटर आगे लगभग 40 मीटर ऊँचे टीले पर स्थित है गढ़वाल प्रसिद्ध देवस्थल सिद्धबली मन्दिर। यह हनुमान जी का एक पौराणिक मन्दिर है। इस मंदिर में आने वाले साधकों को अप्रतिम शांति की अनुभूति होती है।

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