बेटों को सबक, पिताओं को उम्मीद

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक
1 मार्च, 1988
मालवा एक्सप्रेस तय समय पर नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर रुकी थी। उसमें से एक दुबला-पतला लड़का हाथ में लोहे का बक्सा लिए नीचे उतरा था।
कांगड़ा का स्वाद – लुंगडू का अचार

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
जब भी मैं हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा की वादियों में जाता हूँ तो अचार और चायपत्ती जरूर लाने की कोशिश करता हूँ। कांगड़ा के बाँस के अचार का स्वाद सालों से जुबाँ पर है। पर इस बार यहाँ देखने को मिल लुंगड़ू का अचार । दुकानदार ने बताया यह सर्दिंयों के लिए अच्छा है। सो हमने एक पैकेट खरीद लिया। सर्दियों में बाँस का अचार भी खाना अच्छा रहता है। अब बात लुंगडू की। लुंगडू यानी ( Fiddle head fern) का अचार कांगड़ा की खास विशेषता है।
पालमपुर – धौलाधार के धवल शिखर देखिए यहाँ से

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
कांगड़ा की हसीन वादियों के बीच पालमपुर शहर। शहर के अंदर तो बाकी शहरों की तरह भीड़भाड़ दिखायी देती है। पर यहाँ से धौलाधार पर्वत के उच्च शिखर दिखायी देते हैं। खास तौर पर जब इन शिखरों पर बर्फबारी हो गयी हो तो इनका सौंदर्य और बढ़ जाता है।
हम अंदर की कमजोरियाँ हारते हैं

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
मेरी एक परिचित ने मुझे बताया कि उनकी बेटी, जिसकी शादी उन्होंने कुछ ही दिन पहले एक अमीर घर में की थी, वो किसी और से प्यार करने लगी है। जाहिर है शादी के बाद बेटी का किसी और से प्यार करना मेरी परिचित को नागवार गुजर रहा है। उन्होंने अपनी तकलीफ मुझसे साझा की। उनकी तकलीफ अब मेरी तकलीफ बन गयी है। मैं सारी रात सोचता रहा कि मैं इस विषय पर लिखूँ या नहीं।
गाली लंगड़ी होती

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
कायदे से ये कहानी मुझे कल ही लिखनी चाहिए थी। घटना कल की ही है।
आनंदपुर साहिब से कांगड़ा

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
आनंदपुर साहिब का बस स्टैंड छोटा सा है पर साफ-सुथरा। स्वच्छ भारत अभियान का असर दिखायी देता है। यहाँ से मैं कांगड़ा के लिए बस के बारे में पूछता हूँ। लोग बताते हैं कि नंगल चले जाइए वहाँ से मिली। नंगल जाने वाली बस में बैठ जाता हूँ। नंगल 20 किलोमीटर आगे है।
सिख इतिहास की दास्ताँ सुनाता – विरासत ए खालसा

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
पवित्र शहर आनंदपुर साहिब में अब एक नया आकर्षण है विरासत ए खालसा। खालसा हेरिटेज के नाम से मशहूर इस विशाल इमारत में आप आडियो विजुअल प्रदर्शनी के माध्यम से 500 साल के सिख इतिहास से रूबरू होते हैं।
महिलाओं में ईश्वर का निवास है

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
जाती हुई सर्दी बहुत बुरी होती है। जाते-जाते छाती से चिपक गयी है।
गुरुद्वारा – किला आनंदगढ़ साहिब

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
आनंदपुर साहिब में रेलवे स्टेशन से बाहर निकलने के बाद सबसे पहले किला आनंद गढ़ साहिब में पहुँचा जा सकता है। यह किला आनंदपुर साहिब शहर के बीच में स्थित है। दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने इलाके में पाँच किलों की स्थापना की थी, आनंद गढ़ साहिब उनमें से एक है। यह मुख्य गुरुद्वारा केशगढ़ साहिब से 800 मीटर की दूरी पर स्थित है। गुरु गोबिंद सिंह जी को 1689 से 1705 के बीच मुगलों और पहाड़ के राजाओं से कई युद्ध लड़ने पड़े थे।
रिश्ते जरूर बनाये, अकेलापन से बड़ी कोई सजा नहीं

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
मन में हजार कहानियाँ उमड़ती घुमड़ती रहीं।
कल मुंबई में कुछ फोन चोरों को लोगों ने पकड़ कर चलती ट्रेन में नंगा करके बेल्ट से पीटा, मोबाइल से उनकी तस्वीरें उतारीं, तस्वीरें मीडिया तक पहुँचाई गयीं और इस तरह हमने देखा और दिखाया कि हम किस ओर बढ़ चले हैं।
खैर, सुबह-सुबह बुरी खबरें मुझे विचलित करती हैं।
रिश्तों का पाठ

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
मेरी माँ की तबियत जब बहुत खराब हो गयी थी तब पिताजी ने मुझे पास बिठा कर बता दिया था कि तुम्हारी माँ बीमार है, बहुत बीमार। मैं आठ-दस साल का था। जितना समझ सकता था, मैंने समझ लिया था। पिताजी मुझे अपने साथ अस्पताल भी ले जाते थे। उन्होंने बीमारी के दौरान मेरी माँ की बहुत सेवा की, पर उन्होंने मुझे भी बहुत उकसाया कि मैं भी माँ की सेवा करूं।
आज की मस्ती कल भारी पड़ेगी

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
मेरी आज की कहानी बड़ों से ज्यादा बच्चों के लिए है। अब बच्चे तो मेरे दोस्त हैं नहीं, तो बच्चों के पापाओं और बच्चों की मम्मियों से मैं अनुरोध करूँगा कि मेरी आज की पोस्ट वो अपने बच्चों को जरूर सुनाएँ।



संजय सिन्हा, संपादक, आजतक 





