आम आदमी के नये ताजमहल की कहानी

निर्देशक सुमित ऑजमंड शॉ की छोटी फिल्में सोशल मीडिया पर जबरदस्त ढंग से वायरल हो रही हैं। जर्मन दूतावास के लिए सुमित ऑजमंड शॉ की निर्देशित लघु फिल्म “लेबे जेट्ज कल हो ना हो” को यू-ट्यूब पर 10 लाख बार से ज्यादा देखा गया और अभी उनकी नयी फिल्म “द मैन हू बिल्ट ऐनदर ताज” को देखने वालों की संख्या 35 लाख को पार कर गयी है। उनकी वायरल हो रही फिल्मों और इस नये ऑनलाइन मंच के बारे में एक बातचीत।
बापू और अंबेडकर के साथ पुडुचेरी की शाम

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
अगर आप हिन्दुस्तान के इस छोटे से सुंदर से शहर पुडुचेरी में हैं तो शाम गुजारने के लिए गाँधी प्रतिमा से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती। न सिर्फ देशी बल्कि विदेशी लोग भी यहाँ घंटों फुरसतियाते मिल जाएँगे। गाँधी स्टैच्यू के दोनों तरफ पुडुचेरी में बने इस मरीन ड्राइव की लंबाई करीब 1.25 किलोमीटर है।
तैयारी खुशियों की

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
वैसे तो माँ रोज पूरे घर को खूब साफ करती थी, लेकिन दिवाली के मौके पर वो एक-एक चीज को उठा कर साफ करती। घर के सारे पँखें साफ करती, पूरे घर को धोती।
गली कासिम जान- गालिब की हवेली

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
पुरानी दिल्ली में चाँदनी चौक से फतेहपुर मस्जिद की ओर बढ़ते हुए गुरुद्वारा शीशगंज और नयी सड़क के बाद बायीं तरफ आता है बल्लीमारान। वैसे तो बल्लीमारान आज की तारीख में चश्मे और जूते चप्पलों को बड़ा बाजार है। पर इन्ही बल्लीमारान की गलियों में थोड़ी दूर चलने पर आपको गली कासिम जान का बोर्ड नजर आता है। इस बोर्ड को देखकर कुछ याद आने लगता है।
प्यार का बंधन

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
जब मैं छोटा बच्चा था, कभी-कभी मैं माँ को परेशान करने के लिए पलंग के नीचे छिप जाता। माँ मुझे ढूँढती, आवाज देती और फिर इधर-उधर पूछना शुरू कर देती।
पैकेज की मुहब्बत

आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
एसएमएस भेजने के एक नियम के मुताबिक, रियायती पैक लेने वाले अगर एक फोन नंबर से एक दिन में 100 से अधिक एसएमएस भेजेंगे, तो उन्हें हर एसएमएस के लिए 50 पैसे चुकाने होंगे।
जिन्दगी को फुल मस्ती में जीते हैं सरदार

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
एक ट्रेन में दो दोस्त यात्रा कर रहे थे। दोनों दोस्त एक दूसरे को चुटकुले सुना रहे थे, और हँसते हुए चले जा रहे थे। उनके सामने वाली सीट पर क्योंकि एक सरदार जी यात्रा कर रहे थे, इसलिए दोनों दोस्त संता सिंह और बंता सिंह वाले चुटकुलों में से सरदार शब्द हटा देते और खुशी से चुटकुले सुनाते, हँसते, खिलखिलाते।
मुगल बादशाह के स्वागत में बना था जहाँगीर महल

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
अत्यंत भव्य जहाँगीर महल ओरछा के राजमहल का प्रमुख हिस्सा है। इस महल का एह हिस्सा शीशमहल होटल में तब्दील कर दिया गया है। जहाँगीर महल के बारे कहा जाता है कि इस भव्य महल को ओरछा के राजा वीर सिंह देव प्रथम (1505 से 1527) ने शहंशाह जहाँगीर के स्वागत में बनवाया था।
ओरछा : राजा राम का मंदिर

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
देश में राजा रामचंद्र का एक ऐसा मंदिर है, जहाँ राम की पूजा भगवान के तौर पर नहीं बल्कि राजा के रूप में की जाती है। अब राजा राम हैं तो उन्हें सिपाही सलामी भी देते हैं। हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में स्थित ओरछा के राजा राम मंदिर की। यहाँ राजा राम को सूर्योदय के पूर्व और सूर्यास्त के पश्चात सलामी दी जाती है। इस सलामी के लिए मध्य प्रदेश पुलिस के जवान तैनात होते हैं।
मन का भाव

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
मुझे एकदम ठीक से याद है कि इस विषय पर मैं पहले भी लिख चुका हूँ। पर क्या करूँ, हर साल जब मैं ऐसी स्थिति में फंसता हूँ, तो मुझे एक-एक कर सारी घटनाएँ फिर से याद आने लगती हैं और मैं चाह कर भी अपने अफसोस को छुपा नहीं पाता।
रायते में डूबे समोसे का क्या कहना

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
दो समोसे दही के शानदार रायते में डूबे हुए। पत्ते के दोने में परोसे गये। यह है ओरछा की सुबह का नास्ता। हालाँकि रायता समोसा बुंदेलखंड कई शहरों का लोकप्रिय नास्ता है पर जैसा रायता समोसा ओरछा में मिलता है वह और कहीं नहीं मिलेगा। राजा राम मंदिर के सामने चौराहे पर कई मिष्टान भंडार में आपको यह नास्ता मिल जाएगा। समोसे तो आपने अक्सर चटनी के साथ खाये होंगे पर इसे बूंदी रायता में डूबा कर खाने का आनंद कुछ अलग ही है।
हर महिला में माँ छुपी होती है

संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :
छोटा था तो मेरे स्कूल जाने से पहले माँ जाग जाती थी। चाहे रात को सोने में उसे कितनी भी देर हुई हो, पर वो मुझसे पहले उठ कर मेरे लिए नाश्ता तैयार करती, लंच बॉक्स सजाती, मेरी यूनिफॉर्म प्रेस करती और फिर मुझे प्यार से ऐसे जगाती कि कहीं अगर मैं कोई सपना देख रहा होऊँ तो उसमें भी खलल न पड़ जाए। मैं जागता, रजाई मुँह के ऊपर नीचे करता, फिर सोचता कि रोज सुबह क्यों होती है, रोज स्कूल क्यों जाना पड़ता है, रोज भरत मास्टर को वही-वही पाठ पढ़ कर क्यों सुनाना पड़ता है। मुझे लगता था कि स्कूल को मंदिर की तरह होना चाहिए, जिसकी जब श्रद्धा हो चला जाए।



विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :





