युवाओं के दिल में

आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
विकट अज्ञान और कनफ्यूजन में दिन बीते साहब। पहले एक सर्वे में साफ हुआ था कि भारतीय सन्नी लियोन (वस्त्र मुक्ति अभियान की वरिष्ठ कार्यकर्ता) के दीवाने हैं। मैं तो मान रहा था कि युवाओं के दिल में सन्नी लियोन बसती हैं। पर नहीं, कल मेरे मुहल्ले में बहुत पोस्टर दिखे, जिसमें लिखा था कि देश के युवाओं के दिल में बसने वाले एक नेता को युवाओं की माँग पर आगे लाया गया है।
जिनके पास भावनाएँ हैं, वही जिन्दगी के मर्म को समझता हैं

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
मेरा एक दोस्त बहुत व्यस्त रहता है। सारा दिन काम में डूबा रहता है। उसके फोन की घंटियाँ थमने का नाम नहीं लेतीं। सारा दिन फोन कान पर ऐसे चिपका रहता है मानो फोन का अविष्कार नहीं हुआ होता तो वो जिन्दगी में कुछ कर ही नहीं पाता।
विजयवाड़ा से वासवीधाम की ओर एनएच 5 पर

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
मैं विजयवाड़ा रेलवे स्टेशन सही समय पर पहुँच चुका था। यहाँ से आगे मुझे पहुँचना है वासवी धाम, पेनुगोंडा जो राजामुंदरी के पास है। शादी में शामिल होना है। रत्नाराव जी के बेटे बालगंगाधर की। रत्नाराव जी के लिए हम परिवार के सदस्य की तरह हैं। साल 2007 में हैदराबाद के वनस्थलीपुरम में उनके घर रहने के बाद एक रिश्ता बन गया।
भीतर से ही उड़ान संभव

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
बहुत दिनों बाद उड़ने वाले गुब्बारे की याद आयी। याद क्या आयी, समझ लीजिए कि मैं सावन में लगने वाले मेले में पहुँच गया। मुझे याद आने लगा कि माँ मुझे एक रुपया देती थी, सोमवारी मेले में जाने के लिए। मैं मिट्टी के खिलौने खरीदता, आलू टिक्की खाता, और आखिर में दस पैसे का गुब्बारा खरीदता। गुब्बारे को अपनी साइकिल की हैंडिल पर बांधता और दनदनाता हुआ घर पहुँचता।
डलहौजी से यादें जुड़ी हैं सरदार अजीत सिंह की

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
ये साल 1946 की बात है। देश आजादी के दहलीज पर खड़ा था। भारत की अंतरिम सरकार बन चुकी थी। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के महान सपूत सरदार अजीत सिंह को रिहा करवाया। सभी जानते हैं कि सरदार अजीत सिंह भगत सिंह के चाचा थे। वे पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन के प्रणेता थे।
रिश्तों को दस्तक दीजिए

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
कोई 60 साल पुरानी बात है, एक लड़की की बहुत धूम-धाम से शादी हुई। शादी के बाद लड़की के पाँच बच्चे हुए। चार बेटियाँ, एक बेटा। पूरा परिवार खुश।
पहले बेटियों की शादी हुई, फिर बेटे की। कुछ दिनों बाद पति का निधन हो गया। बेटियाँ ससुराल में सेटल हो चुकी थीं, बेटा अमेरिका में सेटल हो गया था। रह गयी थी माँ।
जहाँ प्रेम, वही संसार

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
प्रेम में बहुत शक्ति है।
मेरी एक परिचित मुझसे जब भी मिलती हैं, वो ‘राधे-राधे’ कह कर बात की शुरुआत करती हैं।
आइए याद करें तिरंगे झंडे के डिजाइनर को – पिंगाली वेंकैया

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
क्या आपको पता है हमारे देश के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे झंडे को डिजाइन किसने किया था। वह थे बहुआयामी प्रतिभा वाले आंध्र के स्वतंत्रता सेनानी श्री पिंगाली वेंकैया। विजयवाड़ा के एमजी रोड यानी महात्मा गाँधी रोड पर स्थित है विक्टोरिया जुबली म्युजियम। एक छोटा सा संग्रहालय है जिसके साथ स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की कई स्मृतियाँ जुडी हैं। इस संग्रहालय का प्रबंधन आंध्र प्रदेश राज्य का पुरातत्व विभाग करता है।
हर साल सूखे की मार झेलता मराठवाड़ा

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
हर साल अप्रैल महीना शुरू होने के साथ ही महाराष्ट्र का मराठवाड़ा क्षेत्र चर्चा में आ जाता है। चर्चा सूखे के कारण होती है। हमें सूखे की आहट अहमदनगर से मिलने लगती है। साल 2013 में जब शिरडी गया था तब वहाँ के स्थानीय लोग कह रहे थे पानी की भारी कमी है। इसलिए बाबा के दरबार में श्रद्धालु कम आ रहे हैं। साल 2015 का मार्च के महीने का आखिरी दिन हैं।
जीता वही सिकंदर, हार के बाद जीत

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
मुझे नहीं पता कि ये मुहावरा किसने गढ़ा होगा कि जो जीता वही सिकंदर।
गाँधी हिल्स – बापू की याद में पहाड़ी पर स्मारक

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
बापू की स्मृतियाँ जहाँ-जहाँ हम वहाँ-वहाँ। विजयवाड़ा के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से एक है गाँधी हिल्स। ये पहाड़ी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 10 के सामने है। सड़क के बगल में प्रवेश द्वार है। यहाँ आपको 10 रुपये का टिकट लेकर प्रवेश करना पड़ता है। प्रवेश का समय शाम 4.30 बजे से रात्रि 8 बजे तक का है। शहर की एक पहाड़ी पर माँ कनक दुर्गा बसती हैं तो दूसरी पहाड़ी पर गाँधी जी। देश के आजाद होने के बाद बापू की याद में यह कोई पहला स्मारक है जो किसी पहाड़ी पर बना है।
बच्चे के मन को पहचानें, धन को नहीं

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
माँ की सुनाई तमाम कहानियों में से ये वाली कहानी मुझे हमेशा ऐसे वक्त में याद आती है, जब इसकी सबसे अधिक जरूरत पड़ती है।
कुछ दिन पहले मुझसे कोई कह रहा था कि उनका बेटा ठीक से पढ़ाई नहीं करता। उसके नंबर हमेशा कम आते हैं और सबसे दुख की बात ये है कि पति-पत्नी दोनों बच्चे को पूरा समय नहीं दे पाते।



आलोक पुराणिक, व्यंग्यकार :
संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :





