Wednesday, March 18, 2026
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शादी की बंजर भूमि पर प्यार के फूल खिलाओ

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

एक पिता और पुत्र ट्रेन में सफर कर रहे थे। पिता पुत्र से कहता नंबर तीन और दोनों जोर-जोर से हँसने लगते। दोनों की हँसी थमती और फिर पुत्र कहता नंबर सात। पुत्र के मुँह से नंबर सात निकला नहीं कि दोनों पेट पकड़ कर हँसने लगते। 

जिन्दगी जीने के 10 नुस्खे

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

बचपन में जब मैं प्रेमचंद के किसी उपन्यास को पढ़ता तो मेरे मन में यही ख्याल दौड़ता कि मैं बीए तक पढ़ाई करूंगा। 

उनकी किताबों में लिखा रहता था - प्रेमचंद, बीए।

पुणे का राजा दिनकर केलकर म्युजियम

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

देश कुछ बेहतरीन संग्रहालयों में से एक है पुणे का राजा दिनकर केलकर म्युजियम। ये संग्रहालय पुणे के शुक्रवार पेठ में स्थित है। यह संग्रहालय किसी एक आदमी के प्रयास से किए संग्रह का बेहतरीन नमूना है। इस संग्रहालय की स्थापना 1962 में हुई थी।

पुणे के काका हलवाई

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

पुणे के काका हलवाई। पुणे की प्रसिद्ध मिठाई की दुकान। पुणे के प्रसिद्ध दगडुसेठ हलवाई गणपति मंदिर से थोड़ी दूरी पर है ये मिठाइयों की दुकान। यूँ तो हमें इस दुकान के बारे में पहले पता नहीं था। पर बाहर से विशाल इमारत और आसमान में लहराते बड़े से बोर्ड को देखकर इच्छा हुई इस दुकान से कुछ स्वाद लेने की। तो मैं और अनादि काका हलवाई के शोरूम में प्रविष्ट हुए।

प्यार के बीज

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

मेरी तीन नानियाँ थीं। तीन नहीं, चार। 

चार में से एक नानी मेरी माँ की माँ थी और बाकी तीन मेरी माँ की चाचियाँ थीं। माँ तीनों चाचियों को बड़की अम्मा, मंझली अम्मा और छोटकी अम्मा बुलाती थी, इसलिए माँ की तीनों अम्माएँ मेरी बड़की नानी, मंझली नानी और छोटकी नानी हुईं। बचपन में मुझे ऐसा लगता था कि चारों मेरी माँ की माँएं हैं और इस तरह मेरी चार नानियाँ हैं। पर मैंने पहली लाइन में ऐसा इसलिए लिखा है कि मेरी तीन नानियाँ थीं, क्योंकि मेरी माँ की माँ के इस दुनिया से चले जाने के बाद मुझे अपनी उन तीन नानियों के साथ रहने का ज्यादा मौका मिला, जो माँ की चाचियाँ थीं। 

पार्क में बैठे ओशो – मानो अभी बोल उठेंगे

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

पुणे शहर से कई लोगों को रिश्ता जुड़ा है। कभी यह गाँधी और अंबेडकर का शहर था। तो पुणे आध्यात्मिक गुरु आचार्य रजनीश यानी ओशो की भी स्थली रही है। ओशो अमेरिका से वापस आने के बाद अपने आखिरी वक्त में यहीं पर रहे। पुणे ही क्यों भला। एक तो पुणे का मौसम है जो काफी लोगों को अपनी ओर खिंचता है।

आज के तुलसी

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

“राम जी अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र थे। बहुत बहादुर थे। सभी लोग उन्हें बहुत प्यार करते थे।”

एक मराठी शादी में….बारी बरसी खटन गया सी…

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

फरवरी 16 साल 2016 की सुबह हमारा पुणे जाना हुआ था शादी में शामिल होने के लिए। शादी किसकी। हमारी साली साहिबा की। वे रेडियोलॉजिस्ट हैं। पटना की हैं पर मुंबई में रहते हुए उन्होंने अपने लिए मराठी दूल्हा ढूँढा। तो शादी की सारी रश्में मराठी रीति रिवाज से होनी थी।

जीवन का मंदिर

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

दुनिया भर के धर्म प्रचारकों, अपने दुश्मनों को मुँहतोड़ जवाब देने के लिए व्याकुल वीर पुरुषों, अपने-अपने मजहब के लिए दूसरों के सिर कलम कर देने का दम दिखाने वालों, चंद रुपयों के लिए किसी के दिल पर नश्तर चला देने वाले महान मनुष्यों, आओ, मेरे साथ तुम जिन्दगी के उस सत्य को देखो, जिसे देख कर हजारों साल पहले सिद्धार्थ नामक एक राजकुमार सबकुछ छोड़ कर संन्यासी बन गया था।

बुधवार पेठ – यहाँ सावित्री बाई फूले ने खोला था पहला बालिका विद्यालय

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

अगर महाराष्ट्र का शहर मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है तो पुणे महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी। पुणे महाराष्ट्र का पुराना शहर है। इसे पुण्य नगरी भी कहा जाता है। पर पुणे शहर के दो हिस्से हैं। पुराना शहर और नया शहर। बात पुराने शहर की करें तो यह पेठ का शहर है।

मन की कमजोरी

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

हाथी वाली कहानी आप सबने बचपन में ही सुन ली होगी। 

मैं जानता हूँ कि पहली पंक्ति पढ़ कर एक क्षण में आपके जेहन में न जाने हाथियों की कितनी कहानियाँ कौंध पड़ी होंगी।

आगा खाँ पैलेस : जहाँ बा बापू का साथ छोड़ गयीं

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :

पुणे के यरवदा इलाके में स्थित आगा खाँ पैलेस, देश के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास बताने वाले प्रमुख स्मृति स्थलों में से एक है। मुख्य सड़क पर स्थित यह विशाल इमारत ब्रिटिश सत्ता से भारत के संघर्ष की कहानी सुनाता है। आगा खाँ पैलेस इसलिए खास है क्योंकि बापू ने यहाँ गिरफ्तारी (नजरबंदी) का लंबा वक्त गुजारा, साथ ही बापू के दो प्रिय लोग इसी इमारत में उनका साथ छोड़ गये।

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