मानो तो गंगा माँ हूँ….

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
गंगा अवतरण की कथा रामायण में मिलती है। अयोध्या के सूर्यवंशी राजा सगर अश्वमेध यज्ञ करने की ठानी। उनके अश्वमेध यज्ञ से डरकर इंद्र ने राक्षस रूप धारण कर यज्ञ के अश्व को चुरा लिया और पाताल लोक में ले जा कर कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया।
महिलाओं को गिफ्ट में प्यार चाहिए

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
सिनेमा और हकीकत में कोई अंतर नहीं होता है।
याद कीजिए फिल्म सत्ते पे सत्ता का वो सीन जब अमिताभ बच्चन को हेमा मालिनी से प्यार हो जाता है, और वो उनसे पहली बार जब मिलने जाते हैं, तो अपने साथ बतौर गिफ्ट एक तरबूज लेकर जाते हैं। अमिताभ की इसी अदा पर वो मर मिटी थीं और उन्होंने फिल्म में अमिताभ बच्चन से शादी कर ली थी।
माँ हर मुसीबत से बचाती है

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
पिछले कई दिनों से मुझे खाँसी थी। दिन भर तो ठीक रहता, पर रात में खाँसी आती तो नींद खुल जाती।
गंगा सागर में राजा भगीरथ के हंस

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
दूर तक फैली जलराशि के बीच पानी को काट रास्ता बनाती तेजी से आगे बढ़ती फेरी। फेरी के चारों तरफ मंडराते असंख्य हंसों का झुरमुट। हमारे साथ सफर कर रहे जहाज के यात्री ने बताया कि ये राजा भगीरथ के हंस हैं। कौन राजा भगीरथ, अरे वही जो गंगा को धरती पर लेकर आये थे। गंगा सागर के लिए मूरी गंगा नदी में रोज चलने वाली फेरी के चारों तरफ श्वेत धवल हंस मंडराते हैं। आने जाने वाले श्रद्धालु उन्हें आटे की गोलिया खिलाते हैं। वे गोलियों को लपक लेते हैं। इस तरह पता ही नहीं चलता है कब आठ किलोमीटर का नदी का चौड़ा सफर खत्म हो गया।
अपने कर्म सुधार लें

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :
मेरी दीदी की सास ने दीदी को बहुत तकलीफ दी थी। इतनी कि दीदी बिलख उठती थी। दीदी जब भी अपनी बात किसी को बताने की कोशिश करती, तो कोई यकीन नहीं कर पाता कि सचमुच उसके साथ ऐसा हुआ होगा। हम जब भी दीदी के घर जाते, उसकी सास हमें बहुत विनम्र और समझदार नजर आती।
गंगा सागर बार बार

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
सारे तीरथ बार बार गंगा सागर एक बार। बुजुर्गों से ये कहावत बचपन से सुनते आए हैं। आखिर क्या है इस कहावत का राज। एक बुजुर्ग ने ही बताया कि कभी गंगासागर की यात्रा इतनी मुश्किल हुआ करती थी लोग यहाँ अंतकाल में ही जाने की सोचते थे। अगर नहीं लौटे रास्ते में ही ऊपर वाले का बुलावा आ जाए तो भी कोई बात नहीं। पर अब हालात बदल चुके हैं। रास्ता सुगम है और गंगा सागर की यात्रा बार-बार और सालों भर की जा सकती है।
प्राचीन गौड़ मालदा शहर – कभी था ‘लक्ष्मणावती’

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
बंगाल का पुराना शहर गौड़ कभी बंगाल की राजधानी रहा है। गौड़ प्राचीन काल में 'लक्ष्मणावती' मध्यकाल में 'लखनौती'के नाम से जाना जाता था। किसी समय यह संस्कृत भाषा और हिंदू राजसत्ता का बड़ा केंद्र था। गौड़ का सबंध गीत गोविंद के रचयिता जयदेव के अलावा व्याकारणाचार्य हलयुद्ध से रहा है।
खाइए पाटी सपाटा इसमें भरी है खीर

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
आपने बंगाली मिठाइयों के बारे में तो खूब सुना होगा। पर यह संदेश या रसगुल्ले से कुछ अलग है। बंगाल से बाहर इसके बारे में लोग कम ही जानते हैं। बाहर से देखने में मसाला डोसा जैसा। यूँ कहें कि मिनी डोसा की तरह, पर यह कुछ अलग है। यह लोकप्रिय बंगाली मीठा व्यंजन है। इसे कहते हैं पाटी सपाटा। शाम के नास्ते में गौर बांग्ला यूनीवर्सिटी में जब पाटी सपाटा खाने को मिला तो कौतूहल हुआ। खाया तो काफी सुस्वादु लगा। तब एक और माँग कर खाया।
पूर्वोत्तर जाने वाली ट्रेनों की सुध लें रेलमंत्री जी..

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
रेलवे में यात्री सुविधाओं में सुधार और स्टेशनों को चमकाने की खूब बात की जाती है। पर इसका असर देश की राजधानी दिल्ली से पूर्वोत्तर की ओर जाने वाली ट्रेनों में बिल्कुल नहीं दिखायी देता। लालगढ़ से ढिब्रूगढ़ तक जाने वाली अवध आसाम एक्सप्रेस, आनंद विहार से गुवाहाटी जाने वाली नार्थ इस्ट एक्स, दिल्ली से ढिब्रूगढ़ जाने वाली ब्रह्मपुत्र मेल, न्यू अलीपुर दुआर तक जाने वाली महानंदा एक्सप्रेस ये सभी दैनिक ट्रेनें उपेक्षा का शिकार हैं। किसी में एलएचबी कोच नहीं लगे। मोबाइल चार्जर दिखायी नहीं देते। ब्रह्मपुत्र मेल के टायलेट में तो जाले लगे दिखायी दिए। मानो कोच की सफाई महीनों से नहीं हुई हो। हालाँकि ये सारी ट्रेनें भारतीय रेल को राजस्व तो खूब देती हैं पर इनसे सौतेला व्यवहार क्यों। यह सवाल इन ट्रेनों में सफर करने वाले बार-बार पूछते हैं।
सिगरेट और शराब छोड़ अमीर बनें

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक
दो दिन पहले मैंने एक तस्वीर यहाँ फेसबुक पर डाली थी, जिसे मैंने ‘हमर’ कार के साथ खड़े होकर खिंचवायी थी।
झुक जाना मूर्खता नहीं, जीतने के लिए तनना बेवकूफी

संजय सिन्हा, संपादक, आजतक
भोपाल में मेरे साथ एक लड़का पढ़ता था। नाम था आलोक।
आलोक बहुत मिलनसार और विनम्र था। हम दोनों हमीदिया कॉलेज में साथ पढ़ते थे। आलोक की दिलचस्पी राजनीति में थी, मेरी पत्रकारिता में। दुबला-पतला आलोक जब किसी से मिलता तो हमेशा मुस्कुराता हुआ मिलता। कुछ लोग उसकी शिकायत भी करते, पर वो कभी किसी की बुराई नहीं करता। मैं कभी-कभी हैरान होता और उससे पूछता कि आलोक तुम्हें कभी कोई बात बुरी नहीं लगती?
बैजनाथ पपरोला – कांगड़ा वैली रेल का खास स्टेशन

विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :
कांगड़ा वैली रेल के 164 किलोमीटर के सफर में आखिरी स्टेशन जोगिंदर नगर से थोड़ा पहले बैजनाथ पपरोला स्टेशन खास है। यह पठानकोट और जोगिंदर नगर के बीच में इस नौरो गेज नेटवर्क का सबसे बड़ा स्टेशन है। इस मायने में भी ये स्टेशन महत्वपूर्ण है कि नैरोगेज की सारी रेल गाड़ियाँ आखिरी स्टेशन जोगिंदर नगर तक नहीं जाती हैं। कई ट्रेनें पपरोला से ही वापस हो जाती हैं। तो कुछ यहीं से बन कर चलती हैं।



विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार :





