मोह उम्र में ज्ञान से बड़ा है

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संजय सिन्हा, संपादक, आजतक : 

अब आज की पोस्ट पढ़ते हुए मुझे कोसने मत लगिएगा कि वो कहानी मैं कहाँ से लेकर आ गया हूँ, जिसे आप बचपन से सुनते चले आ रहे हैं। पर हर पुरानी कहानी का एक संदर्भ होता है। वजह होती है, पुरानी कहानी को नये मौके पर सुनाने की। 

मेरी एक भाँजी जिसका नाम ज्योति है, बचपन में जैसे ही खाना खाने बैठती, किसी न किसी बात पर रोने लगती। लोग उसे बहुत मनाते, फिर वो चुप होती और खाना खाने बैठती। हम लोग अक्सर उससे मजाक में पूछते थे, “ज्योति, पहले खाना खाओगी कि रोओगी? 

तो, पोस्ट लिखते हुए मेरे मन में आया कि आज मैं आपसे भी पहले पूछ लूँ कि मेरे प्यारे परिजनों, आप पहले कहानी सुनेंगे कि सीधे मुद्दे पर ही आ जाऊँ? 

क्या कहा? पहले कहानी सुनेंगे?

ठीक है सुना रहा हूँ। फिर ये न कहिएगा कि इतनी पुरानी कहानी सुना दी। 

अब ये कहानी अकबर-बीरबल की भी हो सकती है, राजा कृष्णदेव राय और तेनाली राम की भी हो सकती है। 

अकबर-बीरबल टाइप करने में आसानी रहेगी, इसलिए हम इसे अकबर और बीरबल की मान लेते हैं। 

तो, हुआ ये कि एक बार कुछ लोगों ने बीरबल के खिलाफ षडयन्त्र रचा और पहुँच गए अकबर के पास कि हुजूर आपका चहेता बीरबल गजब ढाये हुए है। 

“क्या हुआ? क्या किया बीरबल ने?”

हुजूर, जहाँपनाह! बीरबल सभी कामों को कराने के बदले ऊपर से पैसे कमाता है। इससे आपका नाम बहुत खराब हो रहा है।”

“हुँह! बीरबल की ये मजाल! सरकारी काम के बदले पैसे कमाता है? ये तो बहुत ही बड़ा पाप है। इस बीरबल को सजा दी जायेगी। आप लोग ही कहें, इसे क्या सजा दी जाए?”

“जहाँपनाह, इसे राज्य से दूर कहीं ट्रांसफर कर दीजिए। किसी ऐसी जगह भेज दीजिए, जहाँ पैसे कमाने का स्कोप ही न हो। हमें तो लगता है कि इसे बतौर सजा इतनी दूर भेजें कि इसे अहसास हो कि सरकारी काम में बेईमानी की कितनी बड़ी सजा हो सकती है।

“बीरबल का ट्रांसफर हो गया। उसे राजधानी से दूर कहीं समन्दर के किनारे भेज दिया गया। कहा गया कि अब से तुम्हारा काम सिर्फ समन्दर में लहरें गिनने का है। तुम एक डायरी में रोज ये दर्ज करना कि सुबह से शाम तक और शाम से सुबह तक समन्दर में कितनी लहरें उठीं।

बीरबल ने कहा, “जो आदेश महाराज!”

बीरबल अपने परिवार समेत आगरा से दूर दक्षिण में कहीं केरल के पास पहुँच गये। 

***

बीरबल के खिलाफ षडयन्त्र रचने वालों को चैन मिला। अच्छा हुआ महाराज के मुँह लगे को मुँह की खानी पड़ी। कई दिनों बाद अचानक उन षडयंत्रकारियों के मन में आया कि वो जाकर देखें तो सही कि बीरबल वहाँ कर क्या रहा है। कैसे तनहा जीवन काट रहा है। 

वो बीरबल के पास पहुँच गये। वहाँ उन्होंने देखा कि बीरबल ने बहुत बड़ा महल बना लिया है, मर्सडीज और बीएमडब्लू गाड़ियाँ खरीद ली हैं और ठाठ से एक कुर्सी लगा कर समन्दर के किनारे बैठा है। 

“अबे बीरबल, इतने पैसे कहां से आए तेरे पास?”

“बीरबल षडयंत्रकारियों को देखते ही खिल उठा। “आओ भाइयों, आओ। तुम्हें दिल से धन्यवाद देना चाहता हूँ। तुम लोगों ने अच्छा ही किया जो मेरी शिकायत लगा कर मुझे राजधानी से इतनी दूर इस समन्दर के किनारे लहर गिनने को भिजवा दिया। यहाँ काम बहुत आसान है। रोज सुबह-सुबह समन्दर के किनारे बैठ जाता हूँ, और समन्दर में उठने वाली लहरें गिना करता हूँ।”

“अरे, वो तो ठीक है। लेकिन इतनी दौलत कहाँ से आई?”

“वो तो लहरें गिन कर मैंने कमाये हैं। अब यहाँ जो भी जहाज या नाव आते हैं, मैं उन्हें बीच समन्दर में ही रोक देता हूं। मैं उन्हें खबर पहुँचवाता हूँ कि मेरे पास सरकारी आदेश है कि मुझे लहरें गिननी हैं। लेकिन आप लोगों के जहाज और नाव के किनारे आने से समन्दर की लहरों में व्यवधान पैदा होगा। ऐसे में सरकारी काम रुकेगा। तो अब आप लोग किनारे तक न तो आ सकते हैं, न किनारे से जा सकते हैं। आपको जो करना है, बीच समन्दर में कीजिए। वो बेचारे मुझे पैसे देते हैं कि बीरबल हमें आने दो, एकाध लहरें छूट भी जाएँ तो क्या? अब जब से मुझे लहरें गिनने का काम मिला है, मेरी आमदनी बहुत बढ़ गई है।”

बेचारे षडयंत्रकारियों ने सिर पीट लिया। हमने इसे यहाँ कहाँ भिजवा दिया। यहाँ तो ये फुल मस्ती काट रहा है।

वो भागे-भागे अकबर के पास आए। आते ही उन्होंने राजा के पाँव पकड़ लिये, “महाराज! हमने बीरबल के खिलाफ झूठी शिकायत की थी। अब आप उसे उस समन्दर में लहर गिनने वाले काम से हटा लीजिए। यहाँ बुला लीजिए। महाराज, हम शर्मिंदा हैं।”

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कई बार हम किसी के खिलाफ जब षडयंत्र करते हैं, तो हम अनजाने में उसका भला कर देते हैं। कई बार हम किसी को लहर गिन कर पैसा कमाने का काम भी दिला देते हैं। 

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मैं राजनीतिक पोस्ट नहीं लिखता, लेकिन आज मुझे पता नहीं क्यों लग रहा है कि आप मेरी पोस्ट को किसी राजनीतिक घटना से जरूर जोड़ कर देखेंगे। 

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मैं आपके सवालों का सामना नहीं कर सकता। 

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आपने बचपन में नंदन, चँदा मामा में पढ़ी कहानी दुबारा पढ़ ली है। मजे लीजिए। सोचिए कि किसी को ठिकाने लगाने से कोई ठिकाने नहीं लगता। जीने वाले लहर गिन कर भी जी सकते हैं। और रही बात आज के ज्ञान की, तो आज का ज्ञान बहुत सामान्य है। आज मैं आपको सिर्फ ये बताना चाहता हूँ कि ज्ञान अगर बुद्धि का भतीजा है, तो मोह हृदय का ताऊ है। दोनों के अलग-अलग कार्यक्षेत्र हैं, दोनों के अलग-अलग प्रभाव हैं। क्योंकि मोह उम्र में ज्ञान से बहुत बड़ा है, इसलिए समय के साथ उसे हृदय का साथ छोड़ देना चाहिए। 

काश ऐसा होता!   

(देश मंथन, 17 जून 2015)

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